अच्छी परिवहन सेवा देना सरकार की ही जिम्मेदारी है

अच्छी परिवहन सेवा देना सरकार की ही जिम्मेदारी है

दिल्ली एक ऐसा शहर है जो हमेशा चर्चा का विषय रहता है। राजनीतिक सरगरमियों का केन्द्र तथा आम लोगों की परेशानियों की मिसाल है यह शहर। कभी पानी के संकट के बारे में, कभी बिजली संकट के बारे में, कभी राशन की दुकानों पर राशन ना मिलने पर तथा कभी डाक्टरों, नर्सों, कर्मचारियों, अध्यापकों, फैैक्टरी मजदूरों आदि के संघर्षों की खबर सुर्खिओं में होती हैं। कुल मिलाकर हम कह सकते है कि यह पूर्ण रूप से अशांत शहर है।

यहां की समस्याओं की हाल की खबर परिवहन की समस्या से जुड़ी प्राईवेट ब्लू लाईन बसों के आन्दोलन की है। पिछले कई दिनों से दिल्लीवासियों व इसके सीमावर्ती शहरों के लोगों को यातायात की कठिनाइयां झेलनी पड़ रही हैं। लगभग 3000 बसों का
एकदम सड़क से हटना अवश्य ही कठिनाई खड़ी करता है।

बसों के आपरेटरों व मालिकों द्वारा हड़ताल नई बात नहीं है। हड़ताल का कारण, बसों की परमिट सीमा नहीं बढ़ाना, भी जानी-मानी वजह है। अब बात यह है कि सरकार व बस आपरेटरों के बीच के रस्साकसी के खेल में तकलीफ उठा रही है आम जनता। दिल्ली में लाखों लोग दिल्ली और आस-पास के राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों से रोजी-रोटी के लिए बसों में सफर करते हैं। और ये बस सेवाएं बहुत ज्यादा खराब हैं। लदालद भरी, खिड़कियां, शीशे व सीटें टूटे-फूटे, बहुत ज्यादा किराया, इन सबकी मार खाता है रोजाना बस में बैठने वाला। इस शहर की बसों में जाकर ठीक-ठाक वापिस आने पर लोग शुक्र मनाते हैं कि आज हम सही सलामत घर पहुंच गए। मानों हमने आज की तीर्थ यात्रा कुशल मगंल पूरी कर ली। इन परेशानियों से सरकार, प्रशासन व राजनीतिज्ञ सभी अच्छी तरह वाकिफ़ हैं मगर इसे सुधारने में तथा इसका स्थायी हल निकालने में उनकी कोई रूचि नहीं हैं। अच्छा यातायात, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजी-रोटी ये सब तो लोगों के जन्मसिद्ध अधिकार हैं जिन्हें दिलाना सरकार का फर्ज़ है। जो सरकार
या प्रशासन इन सब सेवाओं को सही ढंग से जनता पर आर्थिक बोझ डाले बगैर पूरा नहीं करती वह एक लोक हित वाली सरकार नहीं हो सकती।

अब सवाल आता हैं कि सालों से चली आ रही समस्या का समाधान क्यों नहीं निकाला गया? दिल्ली में परिवहन सेवाओं का अधिकतम हिस्सा निजी ओपरेटरों को निजी मुनाफे के लिये सौंप दिया गया हैं। बात साफ है कि अगर इन सेवाओं पर धन खर्च किया गया तो मुनाफा कैसे बनेगा। जिन लोक सेवाओं में उद्वेश्य अधिक से अधिक पैसा कमाना हो तो जाहिर है कि वे सेवाएं सुधरेंगी नहीं। खराब व महंगी होती चली जाएंगी। यही कहानी है दिल्ली की बस सेवाओं की। मुनाफा कमाने वाले इस धंधे में जब राजनीतिज्ञ, मंत्री नेतागण, व अधिकारीगण खुद ही शामिल हों, उनके बसों में शेयर हों तो क्या वे सस्ती, अच्छी व सुविधाजनक सेवाएं प्रदान होने देंगे? नहीं, बिल्कुल नहीं। जैसे शेर को अगर इंसान के खून का स्वाद मिल लाए तो वह इंसान को ही खाने लग जाता है और बन जाता है नरभक्षी जानवर। इसी तरह इन मुनाफाखोरों को जब मुनाफे का चस्का लग जाता है तो वे इसे छोड़ते नहीं तथा खुद इंसान होकर भी दूसरे मजदूरों व आम लोगों को आर्थिक, शारीरिक व मानसिक तकलीफें देकर उनका खून चूसते हैं।

हुकूमत व सरकार का काम है, उसकी जिम्मेदारी है कि राजपाट को लोगों की सुविधाओं व जरूरतों की पूर्ति के लिए चलाए। ऐसा करके वे लोगों पर कोई एहसान नही करते हैं ना ही उन्हें भीख या दान देते हैं। अन्य बुनियादी सेवाओं समेत परिवहन सेवा प्रदान करना एक आधुनिक राज्य की निशानी है।

परिवहन की समस्या एक सामाजिक समस्या है जिसे अपने निजी मुनाफों को आगे रखकर नहीं सुलझाया जा सकता। आम जनता जो पिसती है इसमें उसके गुस्से को सिर्फ बस मालिकों की तरफ केन्द्रित करना भी एकतरफी बात करना है। असली बात यह है कि जैसे बिजली, टेलीफोन आदि में निजीकरण को हरी झंडी दिखाई जा रही है उसी तरह परिवहन के क्षेत्र में भी किया जा रहा है तथा असली मुजरिम जो सरकार है उसे लोगों की शुभचिंतक के तौर पर पेश किया जा रहा है। यह एक गुमराह होने तथा भ्रमजाल में फंसने वाली बात है। इस सांझी समस्या का हल भी सांझे ढंग से होगा। यानि मजदूर, गरीब व अन्य आम जनता मिलकर सरकार पर लगातार व एकजुट ढंग से दवाब डाले कि निजी मुनाफे को छोड़कर परिवहन सेवा सुधारने के लिए काम करे।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *