किसकी परीक्षा?

किसकी परीक्षा?

परीक्षा……. विद्यार्थी की परख़,

परीक्षा……..शिक्षक की परख़,

परीक्षा……..समाज की परख़।

गये दिनों, केन्द्रीय माघ्यमिक शिक्षा बोर्ड की दसवीं तथा बारहवीं कक्षाओं की परीक्षाओं के नतीजे घोषित किये गये। इन नतीजों के साथ-साथ, देश भर के करोड़ों छात्रों-छात्राओं के भविष्य के द्वार भी खोले या बंद किये गये। कहीं कहीं से खुशियां मनाई जाने की खबरें मिली, तो कहीं कहीं लड़कों-लड़कियों की खुदकुशी करने की खबरें।

दसवीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षा पास करना किसी भी नौकरी या योग्यता प्राप्त करने के लिये न्यूनतम जरूरत मानी जाती है। सिर्फ़ देश की राजधानी दिल्ली शहर में ही दसवीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षा के नतीजे देखें। एक तरफ, प्राइवेट स्कूल जो कि 88 प्रतिशत छात्रों के पास होने का दावा करते हैं और दूसरी ओर सरकारी स्कूल, जहां सिर्फ 31 प्रतिशत छात्र ही पास कर पाये हैं। पिछले साल सरकारी स्कूलों के 35 प्रतिशत छात्र पास हुये; इस साल यह संख्या और भी घट गई।

इन आंकड़ों से दो सवाल मन में आते हैं। पहला यह कि जब शिक्षा बोर्ड एक है और परीक्षा एक है, तो दो प्रकार के स्कूल और दो प्रकार के शिक्षा स्तर क्यों? एक प्रकार के स्कूल, यानि प्राइवेट स्कूल, ऐसे शिक्षा स्तर का दावा कर सकते हैं जिसमें 88 प्रतिशत छात्र-छात्रा पास हैं। ये हैं वे स्कूल जो हर महीने हजारों रुपये फीस तथा अन्य शुल्क हर छात्र से इकट्ठे करते हैं, जिनकी शानदार इमारतें, प्रयोगशालायें, पुस्तकालय, प्रशिक्षित अध्यापक, ग्राउंड, इत्यादि हैं, जहां अंग्रेज़ी माध्यम में शिक्षा दी जाती हैं, जहां तरह तरह की ज्ञानवर्धक सुविधायें, कंप्युटर, इत्यादि उपलब्ध हैं। घर में पढ़े-लिखें परिवारों की मदद व देखरेख, ट्यूशन, किताबें आदि सुविधायें इन स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चों के पास हैं। आगे जाकर वे अच्छे कालेजों व शिक्षा संस्थानों में ऊंची शिक्षा लेते हैं।

दूसरी तरफ़ मजदूर और मेहनतकशों के बच्चे सरकार द्वारा बनाये गये स्कूलों में पढ़ते हैं। इन स्कूलों ने शिक्षा का तो क्रूर मज़ाक ही बना रखा हैं। दस-बारह साल स्कूल में पढ़ने के बाद भी इनमें से अगर सिर्फ 33 प्रतिशत छात्र-छात्रायें ही बोर्ड की परीक्षा में पास कर सकते हैं, तो बस यह बात ही इन स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा की खुदगवाही है। और जो बच्चे यहां से पास करके निकलते हैं, क्या आगे जाकर वे उन्हीं कालेजों और उन्हीं नौकरियों की उम्मीद रख सकते हैं, जिनमें प्राइवेट स्कूलों के बच्चे लग जाते हैं? जिन्दगी का तजुर्बा इसका जवाब साफ कर देता है – नहीं।

जब दो अलग किस्म के स्कूलों में शिक्षा स्तर का इतना अंतर है तो एक ही बोर्ड की एक ही परीक्षा दोनों किस्म के स्कूलों के बच्चों के लिये लाज़िमी करना सरासर बेइन्साफ है। सरकार कहती है कि वह शिक्षा स्तर में समानता लाना चाहती है। परन्तु अगर शिक्षा स्तर में समानता लानी है तो क्या मौजूदे असमानताओं को पहले दूर करना जरूरी नहीं है?

सच्चाई तो यह है कि हमारे देश में शिक्षा के नाम पर बर्तानवी बस्तीवादियों द्वारा शुरू की गई शिक्षा प्रणाली ही चल रही है। बर्तानवी शिक्षा प्रणाली का मकसद था एक ऐसा खास शिक्षित वर्ग पैदा करना, जो अंग्रेजी भाषा में पढ़ा-लिखा हो, और जो मौजूदे व्यवस्था के प्रति वफादार हो। आज भी शिक्षा व्यवस्था के जरिये समाज में ऐसा ही किया जा रहा है। ऐसा दिखावा किया जाता है कि सबको शिक्षा पाने के बराबर मौके दिये जा रहे हैं। परंतु अगर अधिकतम बच्चे परीक्षा पास ही न कर पाये तो यह कैसी बराबरी? असलियत में, समाज में पहले से ही मौजूद अमीर और गरीब तबकों के बीच की असमानता को शिक्षा प्रणाली के जरिये कायम रखा जा रहा है।

दूसरा सवाल यह है कि सरकारी स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा की असलियत क्या है? क्यों इतने कम बच्चे बोर्ड की परीक्षा पास कर पाते हैं? पांचवी कक्षा तक बच्चे नगर निगम के स्कूलों में पढ़ते हैं जहां न कोई ढंग का मकान होता है, न कक्षायें। बैरक जैसे बिलंडिग में या अक्सर तम्बुओं के नीचे बच्चों को बिठाया जाता है, चाहे गर्मी हो या बरसात या सर्दी। फिर, अक्सर कोई अध्यापक नहीं होता है, या एक अध्यापक को छः-सात कक्षाओं के बच्चों को संभानला पड़ता है। पढ़ाई तो दूर की बात होती है, बस बच्चे आपस में खेल कर या मार-पीट करके घर चले जाते हैं। सरकारी नियमों के अनुसार, पंाचवीं कक्षा तक सभी बच्चों को पास करवाना पड़ता है, सिर्फ 13 प्रतिशत अंक लाने वालों को भी 20 नंबर अतिरिक्त देकर पास करवाया जाता है।

माध्यमिक स्कूलों में भी ऐसी ही हालत है। कहीं-कहीं महीनों या सालों तक अध्यापक नहीं होते। अगर अध्यापक का पोस्ट अनुसूचित जातियों के लिये आरक्षित हो तो जब तक ऐसा कोई उम्मीदवार न मिले तब तक पोस्ट खाली ही रह जाता है। न कोई सही पुस्तकालय है न प्रयोगशाला। अक्सर कक्षा के लिये सही कमरे भी नहीं होते। अगर पढ़ाई होती है तो कंुजियों से बच्चे खुद पढ़ते हैं या स्कूल के बाद ट्यूशन से।

हमारे देश में शिक्षकों का वेतन प्रशिक्षित पेशेवर लोगों में से सबसे कम है। उच्चतर माध्यमिक दर्जे के शिक्षक का वेतन प्राइवेट कंपनियों के रिसेपशेनिस्ट से भी कम होता है। इस वेतन से शिक्षक अपना परिवार भी नहीं पाल सकता। शिक्षकों पर नई पीढ़ी का निर्माण करने की भारी जिम्मेदारी है, परन्तु समाज में उन्हें बहुत नीचा दर्जा दिया जाता है। इसके अलावा, सरकारी और नगर निगम के स्कूलों में उन पर बहुत दबाव डाला जाता है कि बच्चों को पास कर दिया जाये चाहे बच्चों ने कुछ सीखा हो या न हो। 9वीं कक्षा तक बच्चों को 23 प्रतिशत अंक पर, 10 अतिरिक्त अंक देकर पास करवाया जाता है। फिर यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जब इन बच्चों पर वही बोर्ड परीक्षा थोपी जाती है जो दूसरे प्राइवेट स्कूलों के बच्चे लेते हैं, तो उनके लिये पास होना लगभग नामुमकिन होता है।

अगर दिल्ली शहर में यह हालत है तो दूसरे शहरों में भी ऐसी या और बुरी हालत ही होगी। गांवों में स्कूल के नाम से जो जाना जाता है वह अक्सर एक टूटा-फूटा कमरा होता है, जिसमें कभी कभी गाय-भैंस भी रखे जाते हैं। 6-8 जमातों के सभी बच्चों के लिये बस एक ही अध्यापक होता है, तो वह पढ़ायेगा क्या? पीने का पानी, शौचालय, खेलने के मैदान, कुछ भी नहीं होते ऐसे स्कूलों में। फिर यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अधिकतर बच्चे स्कूल छोड़कर, दूसरे काम करने लग जाते हैं।

शिक्षा का पाठ्यक्रम भी बच्चों की जिन्दगी से कोई ताल्लुख नहीं रखता है। बच्चों को ऐसे विषय और ऐसी बाते पढ़नी पड़ती हैं जिनके बारे में उन्हें कोई समझ नहीं है और न ही उनकी जिन्दगी से इन विषयांे का कोई सम्बंध है। पढ़ाई के विषय बेतुके, पढ़ाने वाला कोई नहीं, ऐसी हालतों में भी बहुत बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं।

सरकार का सार्विक शिक्षा प्रदान करने का दावा एक बहुत बड़ा धोखा है। अगर सचमुच सब को सही शिक्षा दिलानी है और शिक्षा स्तरों में समानता लानी है, तो शिक्षा प्रणाली मंे यह दुरंगापन खत्म करना होगा। प्राथमिक स्तर से लेकर उच्चतर स्तर तक सभी को शिक्षा के बराबर के हालात और सुविधायें देनी होंगी। पर यह तभी हो सकता है जब मेहनतकशों और उनके बच्चों को, देश की आम जनता को सिर्फ पूंजीपतियांे के मुनाफ़े बढ़ाने वाली सस्ती मजूरी के रूप में नहीं समझा जायेगा बल्कि एक स्वस्थ, सुशिक्षित, प्रशिक्षित, और जागरूक जनता को देश की प्रगति के लिये एक अनिवार्य व कीमती संसाधन माना जायेगा।

अब टीचर ठेके पर

नगर निगम के स्कूलों में बिगड़ती हालतों की समस्या के जवाब में राज्य सरकार ने यह फैसला किया कि टीचरों को ठेके पर, 89 दिन के लिये नियुक्त किया जायेगा, जहां जहां टीचरों के पोस्ट खाली पड़े हैं।

यह समस्या का कोई हल नहीं है। अध्यापकों का अत्यधिक शोषण और नौकरी की असुरक्षा नगर निगम स्कूलों की हालतों को और बिगाड़ देंगी। स्कूलों में उन्न्ाति टीचरों की अच्छी काम की हालतों से जुड़ी हुई है। इसके बगैर, छात्रों के लिये पढ़ाई का अच्छा वातावरण नहीं बन सकता। छात्रों को साल भर टीचरों का मार्गदर्शन जरूरी है, बीच में दिनों-दिन बगैर टीचर नहीं। इसके लिये टीचरों को सुरक्षित नौकरी और अच्छे वेतनमान चाहियें। नगर निगम स्कूलों का यह तथाकथित सुधार असलियत में एक गलत कदम है और अध्यापकों के लिये बड़ी बेइज़्ज़ती है।

 

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