किसानों की दुर्दशा-हुकूमत पर एक कलंक

किसानों की दुर्दशा-हुकूमत पर एक कलंक

हमारा देश में अगर खेती से संबधित समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए तो यहां इतना अनाज व अन्य खाने की चीजें पैदा हो सकती है जो यहां के लोगों की जरूरत पूरा करके अन्यों की भी मदद कर सकती हैं। पर अफसोस कि खेती करने वाले किसान को आज गंभीर आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ रहा है।

ज्यादातर किसान सिंचाई के लिए कुदरत पर निर्भर होते है। बारिश देर से आए, कम आए या फिर जरूरत से ज्यादा हो जाए तो यह फसल पर बहुत ज्यादा असर डालती हैं। सरकारी तौर पर सिंचाई के लिए नहरें, बांध या जलाशय इतने कम हैं कि सिंचाई की सही समय पर जरूरत पूरी नहीं कर सकते या इनमें पानी ही नहीं होता। कागजों पर या कहने तो ये हैं पर ज्यादातर दिखावटी चीज ही बने रहतें हैं। पारम्परिक ढं्रग से बनी खाद काफी नहीं होती इसलिए किसानों को रसायनिक खादों का सहारा लेना पड़ता है। रसायन का फसल पर क्या असर पड़ता है, कितनी डालनी चाहिए, इसके बारे में सरकार और उसकी ग्रामीण सहकारी समितियां उचित जानकारी नहीं देती।

अगर खेती या फसल के सुधार, बदलाव, तथा विकास के लिए किसान को आर्थिक सहायता की जरूरत पड़ती है तो सरकार का फर्ज बनता है कि सही समय तुरंत और उचित दर पर यह मुहैया करवाए। इस काम में भी अधिकारीगण धांधलेबाजी करके बिचैलियों व दलालों के जरिए कमीशन खाते हैं। यही हाल बीज व बिजली से संबधित है।

सब समस्याओं का सामना करता हुआ किसान अपनी फसल को तैयार कर अनाज, दाल, दलहन आदि के रूप में बाजार में लाता है तो उसे उसकी मेहनत का बहुत ही कम और निराशाजनक दाम मिलता है। ज्यादातर बिचैलिए, आढ़तिए और अन्य कमीशनखोर इनसे अनाज सस्ते भाव में खरीदकर बाजार में कई गुना महंगा बेचकर चांदी कुटते हैं।

आजकल पारम्परिक फसले न उगाकर नकदी फसल के लिए किसानों को प्रेरित किया जाता है। जैसे पंजाब में सूरजमुखी पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है क्योंकि सनफलावर के बीज बाहर विदेशों को भेजे जाते हैं। इस नकदी फसल के लिए किसान को जमीन, बीज, पानी, खाद तथा कीटनाशक सभी में एकदम फेरबदल करना पड़ता है जिससे उस पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। उसे साहुकारों दलालों या एजेंटों से तुरत कर्जा मिल जाने का लालच दिया जाता है। अगर फसल उम्मीद के अनुसार ना हुई, बिल्कुल नष्ट हो गई, तो वे भारी कर्ज तले दबे जाते हैं। नकदी फसल की कमाई पर निर्भर रहने वाला किसान कुदरती विपदा तथा सरकारी नजरअंदाज व कठेारता का शिकार बनकर बेसहारा और लूटा हुआ महसूस करता है। ऊपर से बैंको के या साहूकारों के कर्ज की अदायगी के नोटिसों के दबाव उसके हौंसले को तोड़ देते हैं।

खेती से संबधित समस्याओं और संकटों को दूर करने के लिए सरमायदारी प्रणाली के खिलाफ मजदूर वर्ग के साथ मिलकर सांझा मोर्चा बनाकर संघर्ष करना पड़ेगा।

किसका सुख, किसकी सुरक्षा?

गृह मंत्री श्री अडवानी अपनी सरकार के हर कदम की सफाई देते हुये कहते हैं कि इससे हम सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं। सभी हिन्दोस्तानी जानते हैं कि प्रचीन काल से हर राजा का कर्तव्य अपनी प्रजा को सुख और सुरक्षा प्रदान करना ही रहा है। सवाल तो यह है कि यह सरकार किसकी सुरक्षा कर रही है, किसको सुख दे रही है?

हमारे समाज की बहुसंख्या, मजदूरों और मेहनतकशों को भूख, गरीबी और बीमारियों का सामना करना पड़ता है, उन्हें सुख और सुरक्षा नहीं मिलती। लाखों लोग हर रात भूखे सोने को मजबूर होते हैं, उनके सिर पर छत नहीं होती, उन्हें कल क्या होगा यह पता नहीं होता। 1947 से आज तक ऐसा ही चलता आया है। इस बहुसंख्या, इस प्रजा को
सुख और सुरक्षा दिलाना भाजपा सरकार का इरादा नहीं है, जैसा कि पिछली सरकारों का भी नहीं था।

शोषण करने वाली अल्पसंख्या के सुख, अधिकतम मुनाफे बनाने के उनके सुख की हिफ़ाज़त की जा रही है। बाज़ार की अर्थव्यवस्था कहीं यह सुख पैदा करती है तो बाकी समाज पर दुख फैलाती है। पुलिस और फौज़ द्वारा इसी शोषण की व्यवस्था की हिफ़ाज़त की जाती है।

50 सालों से हमारे हुक्मरानों ने यह झूठ बोला है कि वे जनता को सुख और सुरक्षा देना चाहते हैं पर उन्होंने किया है ठीक इसका उल्टा; जनता के लिये दुख और असुरक्षा, बड़े सरमायदारों के लिये सुख और सुरक्षा। मजदूरों और किसानों को इस झूठ पर यकीन नहीं करना चाहिये।

मजदूर वर्ग और किसानों को एक साथ मिलकर एक ऐसे हिन्दोस्तान के लिए लड़ना चाहिये जहां पूरी आबादी की खुशहाली, प्रजा का सुख और सुरक्षा सुनिश्चित हो, सिर्फ राजा का ही नहीं। इस सुख और सुरक्षा में शामिल है रोटी, कपड़ा, मकान, परिवहन साधन, बच्चों के लिये शिक्षा, स्वास्थ्य सेवायें इत्यादि।

बर्तानवी राज ने प्राचीन हिन्दोस्तानी समाज में राजा और प्रजा के बीच एकता के पुराने आधार को नष्ट कर दिया था। उसकी जगह पर, देशी और अंतर्राष्ट्रीय सरमायदारों की सेवा में नई अर्थव्यवस्था और राजनीतिक सत्ता स्थापित की गई थी। मेहनतकशों का
सुख और सुरक्षा अब इस सत्ता की चालक शक्ति नहीं रही।

बस्तीवादी हुकूमत के खत्म हो जाने के 50 साल बाद भी अधिकतम हिन्दोस्तानी भूख और बीमारी से पीड़ित हैं क्योंकि यही लूट की व्यवस्था हमारी अर्थव्यवस्था की चालक शक्ति आज भी है। हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था से ज्यादा निचोड़ा जाता है और उसमें कम डाला जाता है। तभी तो बार बार और लगातार अर्थव्यवस्था संकट में होती है। उत्पादन का संकट होता है क्योंकि खरीदार कम हैं; वित्त व्यवस्था में संकट होता है जिससे उत्पादन और घट जाती है; फिर बाकी दुनिया के साथ उधार-कर्ज संकट हो जाता है; यही आजकल हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था का किस्सा है।

बस्तीवाद खत्म हो गया परन्तु बस्तीवादी लूट की व्यवस्था खत्म न हुई। यह व्यवस्था, जिसमें स्वदेशी और विदेशी शोषक आपस में होड़ लगाकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफे कमाते हैं, “मुक्त बाजार व्यवस्था” के नाम से जानी जाती है। इसने हिन्दोस्तानियों को गुलाम बना रखा है, भूख और बीमारी के गुलाम। मुट्ठीभर लूटेरे रोज इससे अपने जेब भरते हैं और इसे बचाये रखने के लिये बम फोड़ते हैं।

आज के हालातों में सिर्फ मजदूर वर्ग ही सब को सुख और सुरक्षा दिलाने वाली व्यवस्था बना सकता है। सरमायदार और हुक्मरानों की सारी पार्टियां ऐसा करने में नाकामयाब हैं। यही आज वक्त की पुकार है मजदूर वर्ग से। शोषण की पुरानी व्यवस्था को खत्म करके सारी जनता को सुख और सुरक्षा दिलाने के आधार पर मजदूरों, किसानों और मध्यम वर्गों का इंकलाबी मोर्चा बनाना होगा।

 

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