किसानों की बिगड़ती हालत

किसानों की बिगड़ती हालत

हमारी 70 प्रतिशत जनसंख्या खेती पर निर्भर है। हिन्दोस्तान की प्रगति व खुशहाली किसानों की खुशहाली से जुड़ी हुई है और इस बात से कि खेती किस हद तक लोगों की जरूरतों को पूरा कर पाती है। हिन्दोस्तान के शासक वर्ग देहातों में मेहनतकशों की रोजी रोटी और खुशहाली के सवाल को हल करने में नाकामयाब तो रहे ही, इसके अलावा उन्होंने किसानों की गरीबी व कंगाली की हालतें भी पैदा कर दी हैं।
लाखों-लाखों भूमिहीन व गरीब किसान हर रोज शहरों में रोजी रोटी की तलाश में आते हैं।

देश के हर कोने में देहातों की आबादी बेहद गरीबी की हालतों में है। मध्यम किसानों का जीवन भी असुरक्षित है, क्योंकि उन्हें अपना उत्पादन बाजार के अनुसार बदलना पड़ा है और उन्हें खुद अपनी देखभाल करनी पड़ रही है। दूसरी ओर, देहातों में कुछ मुट्ठी भर लोग पिछले कुछ दशकों से खेती में अपनाये गये पूंजीवादी रास्ते पर चलकर बहुत मुनाफे कमाये हैं।

बस्तीवादी शासन का असर

हमारे किसानों की दर्दनाक हालत की वजह यह है कि हमारे वर्तमान हुक्मरान खेती के सवाल पर अपने बस्तीवादी पूर्वजों से नाता नहीं तोड़ पाये हैं। इसके बजाय, वे बस्तीवादियों के रास्ते पर ही चलते आये हैं। बर्तानवी बस्तीवादियों ने हमारे देश की पुरानी जमीन की मिलकियत, मसलन गांव द्वारा जमीन की सांझी मिलकियत को बदल दिया और उसकी जगह पर जायदाद के हकों की नई व्यवस्था लागू की। कृषि जमीन से अधिकतम राजस्व इकट्ठा करने के इरादे से, उन्होंने जमीन की मिलकियत की कई नई व्यवस्थायें शुरु की। जमीन्दारी, मिरासी और रैयतबाड़ी व्यवस्थाओं की वजह से किसान अपनी विरासती जमीन से अलग हो गये, और उनका कर्जा भी बढ़ गया। राजस्व कर को कठोर ढंग से इकट्ठा किया जाता था, और पैसे में देना पड़ता था, जिससे किसान
सूदखोरों के पास जाने को मजबूर हो गये। किसानों को ज़बरदस्ती से अपनी जमीन से हटाया गया और देहातों मंे नया शोषक वर्ग पैदा हुआ।

खेती का व्यापारीकरण देशी खेती पर एक और वार था। खेती उत्पादन चावल और मोटे अनाजों से हटकर कपास, मुंगफली और नील जैसी व्यापारी फसलों में बदला गया। देहातों के लोगों का मुख्य भोजन, भाजरा का उत्पादन घट गया। व्यापारीकरण की वजह से बहुत से किसान भूमिहीन हो गये। अलग अलग इलाकों में असमान धन का वितरण और असमान कृषि विकास होने लगा। देहातों की आबादी लगातार कर्ज मंे फंसी रही।
सूखा, महामारी और स्थानातरण हर रोज़ की बात हो गयी। 1876-78 के भयानक अकाल में 35 लाख लोग मरे।

बर्तानवी हुकूमत को किसानों, आदिवासियों और दूसरे मेहनतकशों के विद्रोह का सामना करना पड़ा। किसानों और आदिवासियों ने बस्तीवाद विराधी आज़ादी के संघर्ष में बहुत बहादुरी के साथ लड़ाई की। बर्तानवी हुकूमत के खिलाफ़ हिन्दोस्तानी लोगों का राष्ट्रीय संघर्ष साथ ही साथ सामाजिक इंकलाब भी होना चाहिए था। हिन्दोस्तान के पुनर्जीवन के लिये सिर्फ विदेशी बस्तीवादियों को निकालना ही जरूरी नहीं था, बल्कि एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करना जरूरी था जो समाज के सभी लोगों को रोजी रोटी और हकों की गांरटी देती। पर लोगों के बेमिसाल संघर्षोें और कुर्बानियों के बावजूद ऐसा न हो पाया।

बर्तानवी बस्तीवादी हुकूमत के खिलाफ़ आन्दोलन का नेतृत्व मुख्यतः 19वीं सदी के अन्त से , इंडियन नैशलन कांग्रेस के हाथों में था। इन नेताओं ने एक छोटी सुविधा प्राप्त श्रेणी, जो कि किसी सामाजिक इंकलाब के खिलाफ़ था, के लक्ष्यों को संघर्ष के राष्ट्रीय लक्ष्य बना दिया। कांग्रेस पार्टी, जो शुरु से ही हिन्दोस्तानी पंूजीपतियों और जमीन्दारों की पार्टी थी, उन्होंने किसानों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया।

जैसे जैसे किसानों के संघर्ष बढ़ते गये, वैसे वैसे कांगे्रस पार्टी उनकी तरफ थोड़ा ध्यान देने लगी, किसानों के हित में नहीं बल्कि किसानों को बड़े जायदाद वाले वर्गों के मंसूबों के लिये इस्तेमाल करने के मकसद से। 1920वीं, 30 और 40वीं दशाब्दियों के कांग्रेस अभियानों से यह स्पष्ट था कि जनता के विद्रोह को कभी भी हुक्मरानों के “कानून-व्यवस्था”के दायरों से बाहर न जाने दिया गया। विद्रोही किसानों को संघर्ष के दौरान अपनी मांगों और अपना नज़रिया नहीं पेश करने दिया गया। जब 1920 के बाद के सालों में उत्तर प्रदेश के किसानों ने किराया और दूसरे प्रकार के अत्याचारों के
खिलाफ़ संघर्ष किया तो गांधी ने यह उपदेश दिया कि “अगर जमीन्दार आपके ऊपर थोड़ा अत्याचार भी करे, तो आपकों यह बर्दाश्त कर लेना चाहिये। हम जमीन्दारों से नहीं लड़ना चाहते। जमीन्दार भी गुलाम हैं और हम उन्हें तंग नहीं करना चाहते।” वे इस सच्चाई को छिपाना चाहते थे कि जमीन्दार, साहुकार और वे सब जो किसानों को दुर्दशा के लिये जिम्मेदार थे, बस्तीवादियों के साथ मिले हुये थे।

आजादी के बाद की नीति

1947 में बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमीन्दारों के प्रतिनिधि, कांग्रेस पार्टी सत्ता में आई। किसान, जिन्होंने आजादी और उद्धार के लिये मजदूरों-मेहनतकशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया था, देहातों का सम्पूर्ण नवीनकरण और जमीन्दारी को खत्म करना चाहते थे। वे जोतने वाले को जमीन दिये जाने की मांग कर रहे थे, वे खेती की सभी जरूरतों, जीवन तथा सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक प्रगति की मांग कर रहे थे। तेलंगाना संघर्ष उस समय तेज़ी से चल रहा था, और किसानों की इन मांगों की जीती- जागती मिसाल थी।

परन्तु शासक वर्गों के दूसरे इरादे थे। वे केन्द्रित राज्य में सत्ता को केन्द्रित करके उसके जरिय पूूंजीवाद की सेवा में देश के श्रम व धन को इस्तेमाल करना चाहते थे। जब कि किसान व मजदूर एक पुनर्जागृत हिन्दोस्तान के सपने देख रहे थे, तो शासक वर्ग मजदूरों-किसानों के खून-पसीने निचोड़ कर एक साम्राज्यावादी हिन्दोस्तान बनाने के सपने देख रहे थे। शासक वर्ग एक पूंजीवादी व्यवस्था बनाना चाहते थे, जिससे उन्हें हमेशा आधिक से अधिक मुनाफे मिल सकें।

बड़े सरमायदारों ने देहातों में पूंजीवाद को विस्तृत करने और अपना सामाजिक आधार बढ़ाने के लिये भूमि सुधार किया, किसान समुदाय की आकांक्षाओं के खिलाफ़। सरमायदारों के इस भूमि सुधार के पचास सालों बाद, 2 प्रतिशत से कम कृषि भूमि का फिर से वितरण हुआ है, और वह भी जमीन्दारों को बहुत पैसे देकर। आज तक, पश्चिम बंगाल, केरल व कर्नाटक जैसे राज्यों में, जहां “सफल” भूमि सुधारों के गुणगान होते हैं, किसानों की हालत बाकी राज्यों में उनके भाई-बहनों से अलग नहीं हैं। कांग्रेस और दूसरी सरमायदार पार्टियों के भूमि सुधार सरमायदारी सुधार थे। जो कदम जरूरी थे, यानि किसानों का सहकारीकरण करना, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के जरिये उन्हें कम दाम पर सभी खेती की जरूरतें दिलाना और शहरी वस्तुओं के बदले में उनके उत्पादों का बाज़ार में बिक्री करवाना, ये कदम कभी नहीं उठाये गये।

जनता की बहुसंख्या, जिसने सबसे बड़ी कुर्बानियां की थीं, यानि देहातों के किसानों व मेहनतकशों के हितों की अब तक उपेक्षा की गई है। देहातों की आधी आबादी भूमिहीन या अनिश्चित रोजी रोटी वाले खेत मजदूर हैं। मध्यम किसान भी बाजार की अनिश्चितता से तड़प रहे हैं क्योंकि हिन्दोस्तानी सरमायदार और उनके राज्य मध्यम किसानों को भी निचोड़ते हैं। बर्तानवी बस्तीवादियों उनके हिन्दोस्तानी वारिसों का पूंजीवादी रास्ता किसानों और पूरे देश के लिये तबाहकारी साबित हुआ है। आज यह वक्त की मांग है कि जिन उद्देश्यों के लिये किसानों ने बस्तीवादी हुकूमत के दौरान संघर्ष किया था, उन उद्देश्यों को आज की हालतों में साकार रूप दिलाया जाए।

यह तभी हो सकेगा जब हिन्दोस्तान के मजदूर, किसान और दूसरे मेहनतकश खुद सत्ता में होगें और अपने हितों के लिये सत्ता का इस्तेमाल करेंगे, अपने लक्ष्यों को हासिल करेंगे और इस देश में अपनी मनचाही व्यवस्था स्थापित करेंगे।

 

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