गरीब जनता को अन्न दिलाने के नाम मुनाफ़ाखोरी

गरीब जनता को अन्न दिलाने के नाम मुनाफ़ाखोरी

हिन्दोस्तानी की सरकार के खाद्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (राशन व्यवस्था) में अलग अलग राज्यों के बीच भारी असमानतायें देखी जाती हैं। इन आंकड़ों से यह देखने में आता है कि जबकि कुछ राज्यों, मसलन दिल्ली, केरल, आदि में राशन द्वारा वितरित अन्न्ा की मात्रा ज्यादा है, तो कुछ राज्यों मसलन बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उड़िसा व पश्चिम बंगाल में बहुत ही कम अनाज राशन द्वारा वितरित होता है। जबकि यह जानी मानी बात है कि इन राज्यों में गरीबों की संख्या बहुत ही ज्यादा है, चाहे गांव के हो या शहरों के। अर्थात, इन राज्यों में जनता ज्यादा से ज्यादा हद तक खुले बाजार में महंगे दाम पर चावल, गेहूं, चीनी, आदि जरूरी खाद्य सामग्रियां खरीदने को मजबूर होती है। एंेसा क्यों है?

राशन व्यवस्था का तथाकथित मकसद और असलियत

1950 के दशक में राशन व्यवस्था जब शुरू की गई थी, तो सरकार ने यह ऐलान किया था कि इस व्यवस्था के जरिये देश की गरीब जनता को सस्ते व नियंत्रित दामों पर जरूरी खाद्य सामग्रियां प्राप्त होंगी। कहा गया था कि इस कदम से खाद्य सामग्रियों में जमाखोरी, मुनाफाखोरी, काला बाज़ारी, इत्यादि मिटा दिया जायेगा। सिर्फ अनाज, यानि चावल, गेहूं इत्यादि ही नहीं, बल्कि चीनी, सूजी मैदा, सस्ता कपड़ा, खाद्य तेल, मिट्टी, का तेल, इत्यादि जैसी सामग्रियों का भी राशन द्वारा वितरण करने का वायदा किया गया था। पर कुछ ही सालों में इस राशन व्यवस्था का असली रूप सामने आने लगा।

पहली बात, यह व्यवस्था कुछ राज्यों में थोड़ा-बहुत ठीक ढंग से चलायी जाती है। जहां शहर और गांव के मेहनतकश कड़े संघर्ष के उपरांत पाये हैं, जैसे केरल। अधिकतर राज्यों में राशन ठीक ढंग से नहीं चलायी जाती है। अधिकतर राज्यों में राशन व्यवस्था बहुत कम जगहों पर उपलब्ध है।

इसके अलावा, बड़े-बड़े शहरों में अगर राशन व्यवस्था कुछ हद तक उपलब्ध है तो छोटे शहरों तथा देहातों में, जहां अधिकतम गरीब जनता बसी है वहां राशन की दुकान में कुछ मिलता ही नहीं है। इसी वजह से, कुछ राज्यों में राशन द्वारा वितरित अनाज की मात्रा बहुत ज्यादा है तथा कुछ अन्य राज्यों में बहुत ही कम।

दूसरी बात, जहां राशन व्यवस्था है भी, वहां राशन के जरिये कम से कम सामग्रियां, केवल चावल, गेंहू, चीनी और मिट्टी का तेल के अलावा और कुछ मिलती ही नहीं हैं। ये चीजें़ भी अक्सर नहीं मिलती, कभी-कभी एक-दो हफ्तों तक इंतजार करने के बाद ही मिलती हैं। जब मिलती भी हैं तो इन वस्तुओं का वितरण बहुत ही सीमित मात्रा में किया जाता है। मिसाल के तौर पर, प्रति व्यक्ति सिर्फ 800 ग्राम चीनी हर महीने राशन द्वारा दिया जाता है, जब कि किसी भी प्रौढ़ व्यक्ति को एक महीने में इससे ज्यादा चीनी की जरूरत होती है। चावल, गेहूं, मिट्टी का तेल आदि भी किसी भी साधारण परिवार की जरूरतों से बहुत कम मात्रा में मिलती है। इन हालतों में लगभग हर परिवार को ही अपनी जरूरतें पूरी करने के लिये खुले बाजार से अधिक दाम पर चीजें़ खरीदनी पड़ती है।

राशन में मिलने वाले अनाज आदि सबसे घटिया किस्म के होते हैं। अक्सर इनमें कंकड़ आदि मिले हुये होते हैं, चीनी में चूना के ढेले होते हैं। गुणवत्ता नाम की कोई चीज़ हीनहीं होती इनमें।

राशन में सामग्रियां क्यों नहीं मिलतीं?

सरकार यह दावा करती है कि वह राशन द्वारा गरीबों को खाद्यान्न्ा उपलब्ध कराने पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है। यह पैसा जनता से वसूला जाता है। फिर राशन में सामग्रियां क्यों नहीं मिलती? क्योंकि राशन व्यवस्था जमाखारी, मुनाफाखोरी और भ्रष्टाचार का अड्डा बना हुआ है। हर महीने, जो चीनी, चावल, गेहूं आदि राशन द्वारा लोगों को बंाटने के लिये आता है, उनमें से सैंकड़ों किलो माल जमाखोर खरीद लेते हैं। इस प्रकार अभाव पैदा करके, फिर इस माल को खुले बाज़ार में यह काले बाज़ार में तिगुने-चैगुने दाम पर बेचकर वे लोगों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं और बेशुमार मुनाफे कमाते हैं। राशन इंस्पेक्टर रिश्वत खाकर चुप रहता है और उसकी आंखों के सामने यह धांधलेबाज़ी चलती है। इस प्रकार जनता की जेब काटकर चंद मुनाफेखोर और सरकारी अफसर अपनी जेब भरते हैं और गरीब जनता भूखी रह जाती है।

दो स्तरीय राशन व्यवस्था का प्रस्ताव. एक बेरहम मज़ाकसरकार जनता को खाद्य सुरक्षा दिलाने में राशन व्यवस्था की नाकामयाबी और राशन व्यवस्था में धांधलेबाजी से अच्छी तरह वाकिफ़ है। गरीब जनता के गुस्से से अपने आप को बचाने के लिये सरकार ने अब यह प्रस्ताव रखा है कि दो स्तरीय राशन व्यवस्था बनाई जायेगी। एक स्तर “सबसे गरीब” लोगों के लिये होगा जिसमें चीजें सस्ते दाम पर दी जायेंगी और दूसरा स्तर “कम गरीबों” के लिये होगा जिसमें दाम ज्यादा महंगा होगा। अगर ऐसा स्कीम लागू हुआ तो ज़ाहिर है कि भ्रष्टाचार और धांधलेबाज़ी की गुंजाइश कहीं और बढ़ जायेगी। “सबसे गरीब” लोगों को पहचानने के लिये क्या मापदंड होगा यह भी स्पष्ट नहीं है। “सबसे गरीब” को सस्ता अनाज देने के बहाने घटिया से घटिया माल ही दिया जायेगा और अच्छा अनाज सब काला बाज़ार के लिये हटा लिया जायेगा। और राशन व्यवस्था से लाभ उठाने वाली पहले से ही कम जनसंख्या और भी कम हो जायेगी।

राशन व्यवस्था एक और मिसाल है उन कार्यक्रमों का जो सरकार तथाकथित रूप से गरीबों के लाभ के लिये चलाती है पर जिनका लाभ गरीबों को न होकर चंद मुनाफाखोरों और सरकारी अफसरों को होता है। यह इस बात को स्पष्ट कर देता है कि सरमायदारी व्यवस्था अपनी मेहनतकश जनता को दो रोटी भी देने के काबिल नहीं है। बल्कि मेहनतकशों की गरीबी और मजबूरी को भी, जहां मुमकिन हो, अपने मुनाफा़ें का स्रोत बना लेती है।

 

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