गुमराह करने वाली हरकतों से सावधान!

गुमराह करने वाली हरकतों से सावधान!

इस उपमहाद्वीप की जनता की आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक समस्याओं को हिन्दोस्तानी व अंतर्राष्ट्रीय सरमायदार हल नहीं कर सकते हैं। पूंजीवादी – साम्राज्यवादी व्यवस्था के दायरें में ये समस्यायें हल नहीं हो सकती। सिर्फ बड़े इजारेदार पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफों के लिये गरीबों का शोषण और अत्याचार बढ़ सकता है। इसलिये सरमायदार बार बार गुमराह करने वाली हरकतें करते रहते हैं। हमारी समस्याओं की असली वजह, यानि बड़े सरमायदारो की आर्थिक – राजनीतिक व्यवस्था, से हमारा ध्यान हटाने के लिये वे प्रचार करते हैं कि पाकिस्तानी, चीनी, मुसलमान, नागा, आतंकवादी, उग्रवादी, नक्सलवादी, इत्यादि हमारी समस्याओं की वजह हैं।

हिन्दोस्तान के मजदूरों, किसानों, महिलाओं, नौेजवानों, आदि को इन प्रचारांे से गुमराह नहीं हो जाना चाहिये। हमारा मुख्य काम है इस शोषण की व्यवस्था और इसकी हिफ़ाज़त करने वालों के खिलाफ़ सभी मेहनतकश व दबे कुचले लोगों की एकता बनाना। बस्तीवाद और उसकी विरासत से नाता तोड़ने के लिये इस काम पर डटे रहना होगा।

अमरीकी फौज़ अब बंगलादेश में

समाचार पत्रों से जाना जाता है कि अमरीका ने बंगलादेश के साथ स्टेटस आफ फोर्सस (सोफा) समझौता कर लिया है। इस समझौते के अनुसार अमरीकी फौजियों को पूरी छूट मिलेगी कि वे अपनी फौज व फौजी यंत्रो को बंगलादेश में कहीं भी ले जा सकेंगे। अमरीकी फौजियों को घुसने के लिये वीसा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। अमरीकी फौजी यंत्रों को बंगलादेश में लाने या वहां से बाहर ले जाने के लिये कस्टम्स चैक नहीं होगी। समझौते में यह जरूर कहा गया है कि सभी संयुक्त कार्यवाहियों को मेज़बान देश की अनुमति प्राप्त होगी और सिर्फ “आपात्काल” में, “राहत कार्याें के लिये” ही इनका प्रयोग जायेगा, कि अमरीकी फौजियों की “गैर लड़ाकू और मानवीय भूमिका” होगी, इत्यादि।

लेकिन इन दावों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार के समझौतों का इस्तेमाल करके अमरीका ने दुनिया के कई देशों में राजनीतिक और फौज़ी दखलंदाज़ी की हैं। मिसाल के तौर पर, यूरोप और पश्चिम एशिया में इसी प्रकार से अमरीका ने अपने विश्वव्यापी रणनैतिक हितों को हासिल किया है। हिन्दोस्तान और पाकिस्तान द्वारा परमाणु विस्फोटों के बाद अमरीका द्वारा उन पर पाबंदी लगाई जाने की हालतों में, अमरीकी राष्ट्रपति की चीन यात्रा और “दक्षिण एशिया में स्थायी हालत” के बारे में उनकी “चिंता” को ध्यान में रखते हुये, यह समझौता हमारे उपमहाद्वीप की शान्ति और सुरक्षा के लिये काफ़ी खतरनाक साबित हो सकता है।

दक्षिण एशिया में अमरीकी रणनीति का एक अनिवार्य हिस्सा है इस उपमहाद्वीप के देशों में बीच लगातार तनाव की स्थिति बनाये रखना। अमरीका हथियारों और फौजी तकनीकों के लिये इस प्रकार यहां एक स्थायी बाज़ार बना रहा है। इसके अलावा, यह तनाव की स्थिति अमरीका की इस इलाके में “स्थायी हालत” की चिंता के लिये एक बहाना बन जाता है। इससे अमरीकी साम्राज्यवादियों को इन देशों को और हथियार देने, नये झगड़े भड़काने तथा इस इलाके में फौज़ी दखलंदाजी करने का भी बहाना मिल जाता है। इस इलाके के अलग अलग देशों पर अमरीकी आर्थिक, राजनीतिक और फौजी नियंत्रण को मजबूत करके, यह दक्षिण एशिया पर आधिपत्य जमाने की अमरीकी रणनीति को मदद देता है।

परमाणु विस्फोटों के बाद बंगलादेश ने ऐलान किया था कि वह अमरीका के साथ अपने फौजी सम्बंध का “फिर से मूल्यांकन” करेगा। अमरीका के साथ सोफा समझौता इसकी शुरुआत हो सकती है। पर किसी भी हालत में, हिन्दोस्तान के लोगों और इस
उपमहाद्वीप के सभी लोगों के लिये इसका मतलब है कि यहां अमरीकी फौजियों और फौजी हथियारों की तादाद और बढ़ जायेगी, और अमरीका इस इलाके में अपना आधिपत्य जमाने के लिये इस हालत का बड़ी आसानी से इस्तेमाल कर सकता है।

अमरीकी फौज़ अब बंगलादेश में

समाचार पत्रों से जाना जाता है कि अमरीका ने बंगलादेश के साथ स्टेटस आफ फोर्सस (सोफा) समझौता कर लिया है। इस समझौते के अनुसार अमरीकी फौजियों को पूरी छूट मिलेगी कि वे अपनी फौज व फौजी यंत्रो को बंगलादेश में कहीं भी ले जा सकेंगे। अमरीकी फौजियों को घुसने के लिये वीसा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। अमरीकी फौजी यंत्रों को बंगलादेश में लाने या वहां से बाहर ले जाने के लिये कस्टम्स चैक नहीं होगी। समझौते में यह जरूर कहा गया है कि सभी संयुक्त कार्यवाहियों को मेज़बान देश की अनुमति प्राप्त होगी और सिर्फ “आपात्काल” में, “राहत कार्याें के लिये” ही इनका प्रयोग जायेगा, कि अमरीकी फौजियों की “गैर लड़ाकू और मानवीय भूमिका” होगी, इत्यादि।

लेकिन इन दावों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार के समझौतों का इस्तेमाल करके अमरीका ने दुनिया के कई देशों में राजनीतिक और फौज़ी दखलंदाज़ी की हैं। मिसाल के तौर पर, यूरोप और पश्चिम एशिया में इसी प्रकार से अमरीका ने अपने विश्वव्यापी रणनैतिक हितों को हासिल किया है। हिन्दोस्तान और पाकिस्तान द्वारा परमाणु विस्फोटों के बाद अमरीका द्वारा उन पर पाबंदी लगाई जाने की हालतों में, अमरीकी राष्ट्रपति की चीन यात्रा और “दक्षिण एशिया में स्थायी हालत” के बारे में उनकी “चिंता” को ध्यान में रखते हुये, यह समझौता हमारे उपमहाद्वीप की शान्ति और सुरक्षा के लिये काफ़ी खतरनाक साबित हो सकता है।

दक्षिण एशिया में अमरीकी रणनीति का एक अनिवार्य हिस्सा है इस उपमहाद्वीप के देशों में बीच लगातार तनाव की स्थिति बनाये रखना। अमरीका हथियारों और फौजी तकनीकों के लिये इस प्रकार यहां एक स्थायी बाज़ार बना रहा है। इसके अलावा, यह तनाव की स्थिति अमरीका की इस इलाके में “स्थायी हालत” की चिंता के लिये एक बहाना बन जाता है। इससे अमरीकी साम्राज्यवादियों को इन देशों को और हथियार देने, नये झगड़े भड़काने तथा इस इलाके में फौज़ी दखलंदाजी करने का भी बहाना मिल जाता है। इस इलाके के अलग अलग देशों पर अमरीकी आर्थिक, राजनीतिक और फौजी नियंत्रण को मजबूत करके, यह दक्षिण एशिया पर आधिपत्य जमाने की अमरीकी रणनीति को मदद देता है।

परमाणु विस्फोटों के बाद बंगलादेश ने ऐलान किया था कि वह अमरीका के साथ अपने फौजी सम्बंध का “फिर से मूल्यांकन” करेगा। अमरीका के साथ सोफा समझौता इसकी शुरुआत हो सकती है। पर किसी भी हालत में, हिन्दोस्तान के लोगों और इस उपमहाद्वीप के सभी लोगों के लिये इसका मतलब है कि यहां अमरीकी फौजियों और फौजी हथियारों की तादाद और बढ़ जायेगी, और अमरीका इस इलाके में अपना आधिपत्य जमाने के लिये इस हालत का बड़ी आसानी से इस्तेमाल कर सकता है।

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