जीवन का सत्य और निष्ठा

आज के भौतिक युग में हम भोग-विलास की ओर जिस प्रकार दौ़डने लगे हैं, उसमें स्वयं ही थककर निराशा का दामन थामकर बैठ जाते हैं। भोगविलास सुख की अधिकता का प़डाव नैराश्य पर होता है, ऐसे में महापुरुषों, साधु-सन्तों, अवतारों, फकीरों, दार्शनिकों, लेखकों, कवियों तथा अन्य ज्ञान प्राप्त लोगों की सूक्तियाँ हमें ज्ञान का पथ दिखाती हैं। इस संसार के अनेकानेक विद्वानों ने जीवन उपयोगी बाते कहीं हैं जिन्हें हम साधारण भाषा में अनमोल वचन कहते हैं अर्थात ऐसी बातें जो अनमोल हैं और जिनके द्वारा हम अपने जीवन में नई उमंग एवं उत्साह का संचार कर सकते हैं। अनमोल इसलिए भी कहा जाता हैं क्योंकि यदि हम इन बातों का निष्कर्ष समझेंगे तो हम पायेंगे की इन बातों का कोई मोल नहीं लगा सकता, यह वचन अमूल्य हैं। केवल इन बातों को अपने जीवन में अपनाकर, अपने जीवन की दिशा को बदल सकते हैं और जीवन की दिशा बदलनें वाली बातों का भी कभी कोई मोल लगा सकता हैं। बुद्धिमानी से प्रयोग किये गये शब्द चुम्बक की तरह वक्ता या लेखक की तरफ आकर्षित करते हंै। बुद्धिमान लोग अपने चिंतन को आने वाली पी़िढयों के लिए लिखित में सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं ।

दोस्तों इस अंक में हम आपको ऐसी ही श़िख्सयत से रूबरू करवा रहे हैं जिन्होंने विविध प्रकार की सूक्तियां लिखी हैं जो विज्ञान, राजनीति, इतिहास, साहित्य, कला, दर्शन, ज्योतिष, समाजशास्त्र आदि सभी प्रकार के ज्ञान को छूती हैं। तथा आचार, विचार, दैनिक जीवन, संघर्ष, हर्ष-विमर्श, आनंद, उत्साह, आलस्य, मेहनत, दया, धर्म, बंधुता, सद्भावना, नैतिकता-अनैतिकता, सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, झूठ-सच, निंदा-अनिंदा, सुख-दुख, विकास-पतन, श्रेष्ठ, तप, त्याग, करूणा, मोह-माया, ममता, गुरु, माता-पिता, मान-सम्मान आदि न जाने कितने पहलुओं को समेटा है अजमेर शहर, राजस्थान में जन्मे श्री हीरो वाधवानी ने। हीरो वाधवानी ने सच में साहित्य की सार्थकता को सिद्ध किया है। आप एक अद्भुत रचनाकार हैं, जिन्होंने अपनी सूक्तियों से साहित्य में एक नया आयाम स्थापित किया है। आपकी इस विलक्षण प्रतिभा और ज्ञान-पिपासा ने इस विधा को और निखारा है।

वैदिक काल से ही यह होता आया है कि ऋषि-मुनियों, विद्वानों ने अपने सम्पूर्ण जीवन को होम कर अपने चिंतन-मनन से, अनुभव का जो निचो़ड निकाला वह है बोध-वाक्यों या सूक्तियों में, सरल भाषा में इसलिए अभिव्यक्त किया, कि सामान्य या कम प़ढा-लिखा व्यक्ति भी उससे लाभ लेकर जीवन को आनंदमय बना सके और अभीष्ट की प्राप्ति कर सके। यही कार्य श्री हीरो वाधवानी जैसे सद्पुरुष कर रहे हैं। कुछ सूक्तियां देखे- ‘सूर्य, चंद्रमा, प्रकृति और पे़ड इसलिए महान हैं क्योंकि वे अपनी प्राप्त निधि को अपने तक सीमित न रखकर सब में बांटते हैं।’ और देखे- ‘संतान के लिए माता-पिता सर्वोत्तम होते हैं इसलिए परमात्मा ने हमें माता-पिता चुनने की आजादी नहीं दी है।’ ऐसी अनगिनत सूक्तियाँ जिन्हें जानकर भी हम अमल में नहीं लाते या नहीं विचारते। ऐसी सूक्तियाँ जो किसी अच्छे मित्र, अच्छे अभिभावक के साथ रहने जैसा मन में भाव होता है। हीरो वाधवानी लोगों के जीवन को सकारात्मक दिशा देने का अनुपम कार्य, हिंदी भाषा के अंतर्राष्ट्रीय प्रचार-प्रसार में महती योगदान तथा देश की मिट्टी का कर्ज मनिला (फिलीपींस) में रहकर उतार रहे हैं। उनका प्रयास स्तुत्य और अनुकरणीय है। ट्रू मीडिया ग्रुप हीरो वाधवानी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है, आपकी लेखनी की गंध यूँ ही निरंतर महकती रहे।

– आप साहित्य की इस दुनियाँ में कैसे आए? कब आए? क्या परिवार में कोई और सदस्य भी साहित्य सेवा से जुड़ा रहा है? – जब मैं आठवी कक्षा मंे था तो कुछ कविताएं और निबंध लिखे। आगे चलकर हिंदी की पाठय पुस्तकों को प़ढकर मुझे लगा कि इस प्रकार की रचनाएं मैं भी लिख सकता हँू। परिणामस्वरुप दसवीं कक्षा में एक रचना ‘बंद मुठ्ठी का राज’ नामक एक एकपात्रीय एकांकी लिखी जिसमें एक वृद्धा अपने जीवन की घटनाओं का वर्णन करते हुए कहती है कि मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है केवल रेखाएं है और रेखाओं मंे लिखा है- दुख और सुख का कारण स्वयं का विचार और व्यवहार है मेरी यह पहली रचना और पहली सूक्ति है।

– आपको कब महसूस हुआ कि आपके भीतर कोई रचनाकार है? – जब मेरी रचनाएं स्कूल की पत्रिका और स्थानीय पत्रिकाओं मंे छपी तो काफी प्रषंसा मिली, ग्यारहवीं कक्षा में मैंने प्रेमचंद की बू़ढी काकी कहानी पर दस भिन्न-भिन्न विद्याओं मंे रचनाएं लिखी इस पर एकांकी लिखी, लघुकथा लिखी, जीवनी लिखी, डायरी लिखी.. बारहवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में एक पुस्तक थी। गद्य साहित्य के विभिन्न रूप इस पुस्तक से प्रेरित होकर मैंने गद्य साहित्य के विभिन्न रूप इस पुस्तक से प्रेरित होकर मैंने गद्य साहित्य की 18 विविध विधाओं पर लिखा जैसे संस्मरण, रेखाचित्र रिपोर्ताज, गद्यकाव्य, साक्षात्कार आदि इसमें से एक रचना बहुत प्रसिद्ध हुई तीन कंधो वाली अर्थी, जो वास्तविक घटना पर आधारित है। ये रचनाएं मेरी अदबी आईनो नामक सिंधी पुस्तक में है। अब तक मैंने गद्य, साहित्य की 25 विविध विधाओं पर लिखा है।

– हर रचनाकार का कोई न कोई आदर्श होता है जिससे वह लिखने की प्रेरणा लेता है। आपका भी कोई आदर्श जरूर रहा होगा। क्या अब भी आप उसे अपना आदर्श मानते हैं या समय के बदलाव के साथ आदर्श प्रतीकों में कोई बदलाव आया है? – बहुत सारे रचनाकारों की रचनाएं प़ढकर प्रभावित हुआ लेकिन उनको अपना आदर्ष नहीं मानता। मैं सदैव लीक से हटकर लिखना चाहता हँू और लिखा है मुझे कुछ रचनाएं बहुत प्रिय है। जैसे माखन लाल चतुर्वेदी की पुष्प की अभिलाषा, सुभद्राकुमारी चैहान की ‘झांसी की रानी’ और नरोत्तमदास की ‘सुदाना चरित्र’ आदि। – आज के रचनाकारों की पीढ़ी में आपका आदर्श कौन है? – आज के रचनाकारों मंे द्रोणवीर कोहली बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। उन्होंने बहुत अधिक लिखा है मेरे पसंद के रचनाकार बहुत ज्यादा है जैसे डाॅ. हरीओम पंवार, व्यंग्यकार अरविंद तिवारी, सुभाषचंद्र, जयप्रकाष मानस, उद्भांत शर्मा, प्रेम जनमेजय, पं. सुरेष नीरव, वंदना गुप्ता, तेजेन्द्र शर्मा सुरेषचन्द्र सर्वहारा, मन्नू भंडारी आदि।

– लेखन को आप स्वान्तः सुखाय कृत्य मानते हैं या सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते हैं? – मैं लेखन को स्वांत सुखाय मानता हूँ। श्रेष्ठ लेखन वह है जो समाज को कुछ दे सामाजिक परिवर्तन तो प्रमुख है ही।

– जनमानस को प्रभावित करने के लिए आप साहित्य की किस विधा को ज्यादा सशक्त मानते हैं? गद्य को या पद्य को। – गद्य और पद्य दोनों महत्वपूर्ण है लेकिन हीरो वाध्वानी का साक्षात्कार ओमप्रकाश प्रजापति के साथ

मैं पद्य को अधिक महत्व देता हूं यद्यपि मैंने अधिक रचनाएं ग़द्य में लिखी है। हमारे महान गं्रथ भी अधिकांषत पद्य में है। मैंने अधिकतर सूक्तियां लिखी है जो गद्य में होती है लेकिन वे पद्य जैसा आनंद देती है।

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