दक्षिण एशिया के लोगों की प्रभुसत्ता पर हमला

दक्षिण एशिया के लोगों की प्रभुसत्ता पर हमला

अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्ंिलंटन की चीन लोक गणराज्य की 9 दिवसीय यात्रा और इन दोनों विश्व ताकतों के बीच खुलेआम व गुप्त समझौते सिर्फ इन दोनों बड़ी ताकतों के बीच एक दुतरफ़ा मामला नहीं समझा जा सकता है। बल्कि हिन्दोस्तान, पाकिस्तान, पूर्वी एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया के लोगों पर इनका भारी असर पड़ेगा। अपनी यात्रा की शुरुआत में पत्रकारों से बात करते हुये, क्लिंटन ने बड़े खतरनाक ढंग से कहा था कि उनकी यात्रा का मुख्य मकसद था दक्षिण पूर्वी एशिया में वित्त संकट और
दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर बातचीत में चीनी नेताओं को शामिल करना। यात्रा के दौरान, दोनों अमरीकी व चीनी नेताओं ने दक्षिण एशिया की आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक स्थिति पर ”चिंता“ प्रकट की और क्लिंटन ने यह स्पष्ट कह दिया कि अमरीकी प्रशासन के अनुसार दक्षिण एशिया में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी अमरीका की इस बेशर्म हरकत की सख़्त निंदा करती है। यह हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के लोगों के मामलों में खुल्लमखुल्ला
दखलंदाज़ी है। हिन्दोस्तानी मजदूर वर्ग हमारे देश के मामलों में दखलंदाजी करने की विदेशी साम्राज्यवादी ताकतों की कोशिशों को ठुकरा देते हैं। हमारे देश के भविष्य को निर्धारित करने का हक सिर्फ हिन्दोस्तानी लोगों का ही है।

साम्राज्यवादी हस्तक्षेप

बड़ी हेकड़ी के साथ अमरीका ने यह ऐलान किया है कि वह “दक्षिण एशिया में सुरक्षा और स्थिरता” का बीड़ा उठा रहा है। परन्तु यह तो एक ऐसा मामला है जिसे दक्षिण
एशिया के लोगों को खुद, किसी बाहरी दखलंदाज़ी के बिना तय करना होगा। अमरीका का बर्ताव एक बड़ी साम्राज्यवादी ताकत के शोवींवाद का बर्ताव है। आम तौर पर एशिया में और खास तौर पर दक्षिण एशिया में अपनी हरकतों को चीन के साथ मिलकर करने की अमरीका की योजना दूसरे आजाद देशों के मामलों में खुलेआम हस्तक्षेप तो है ही, यह भिन्न्ा राष्ट्रों के बीच बराबरी के सिद्धान्तों का भी उल्लंघन है। यह अमरीकी रणनीति का एक हिस्सा है, जिसका मकसद है आर्थिक और वित्तीय नियंत्रण के जरिये, युद्ध तैयारियों और स्थानीय युद्धों को भड़काने के जरिये एशिया पर अमरीका का आधिपत्य जमाना और एशिया की उन इंकलाबी ताकतों को खत्म करना जो अपने देशों की साम्राज्यवादी लूट-खसौट को रोकने के लिये लड़ रहीं हैं।

शीत युद्ध की नीति-नये रूप में

अमरीकी राष्ट्रपति का यह ऐलान करना कि चीन दक्षिण एशिया में सुरक्षा और स्थिरता का साधन है, यह शीत युद्ध की अवधि की राजनीति की याद दिलाता है, जब अमरीका और भूतपूर्व सोवियत संघ, दुनिया की दो महाशाक्तियां, अपने-अपने हमलावर फौजी गुटों के सहारे सारी दुनिया पर रौब जमाती थीं। उस पूरी अवधि के दौरान, उन दोनों महाशक्तियों के नेताओं के बीच बड़े प्रचार के साथ “शिखर वार्तायें” हुआ करती थीं,
बीच बड़े प्रचार के साथ शिखर वार्ताएं हुआ करती थी। दुनिया में “तनाव कम करने”, “हथियार सीमित करने”, आदि के नाम पर बातें होती थीं तथा उन नेताओं के बीच गुप्त समझौते किये जाते थे, कि कैसे दुनियां के लोगों के खिलाफ़ मिलजुल कर गैर इंकलाबी हरकतें की जायें। अपने अपने प्रभाव क्षेत्रों के बीच दुनिया को बांटने के साथ, उनका
मुख्य उद्देश्य था, सब जगह लोगों के इंकलाबी संघर्षों को कुचलना। उन दोनों के बीच किये गये गुप्त समझौतों का असर दूर दूर के देशों में फौजी तख्तापलट, स्थानीय युद्ध, किराये के फौजियों और नौसेनाओं का दूर देशों में भेजा जाना, आर्थिक और व्यापारी पाबंदियों, में देखा गया।ं इस हस्तक्षेप का सबूत चिली, इंडोनेशिया, दक्षिण एशिया, अंगोला, कैरिबियन व फारस की खाड़ी के लोगों के खून से लिखा हुआ है।

शीत युद्ध के बादें, अमरीकी साम्राज्यवाद दुनिया पर अपना हुक्म चलाने में सफल नहीं हुआ है। “एक धु्रवीय दुनिया” के अमरीकी सपने को दुनिया की दूसरी बड़ी ताकतों के “बहुध्रुवीय” सपने की चुनौती का सामना करना पड़ा है। एशिया में अमरीकी आधिपत्य के सामने चीन एक मुख्य चुनौती बन गई है। परन्तु अमरीका के हमलावर और गैर इंकलाबी मंसूबे नहीं बदले हैं। अमरीका इंकलाबी आन्दोलनों को कुचलने के लिये नये तरीकों व नये समझौतों की तलाश में है। खास तौर पर चीन की ओर अमरीकी नीति का यही मकसद है।

अमरीका जरूर यह चाहेगा कि एशिया के देशों में आर्थिक तौर पर घुसने में उसका प्रथम स्थान हो, कि एशिया में रौब जमाने की चीनी अभिलाषाओं को रोका जाये। चीनी नेता आर्थिक और फौजी तौर पर दुनिया में एक “ध्रुव” बनना चाहते हैं। उनकी यह चाहत अमरीका से जरूर टकरायेगी। लेकिन ये दोनों ताकतें एक बात पर मिली हुयी हैं, कि एशिया और दुनिया के किसी भी देश में कोई इंकलाबी हालत न पैदा हो जाये जिससे साम्राज्यवाद को नुकसान हो सके। चीन और अमरीका के बीच बातों में इंडोनेशिया, कोरियन उपमहाद्वीप और फिलिपीन्स पर बातचीत हुई। अमरीका वहां के लोगों के इंकलाबी आन्दोलनों को खत्म करने के लिये जरूर चीन की मदद मागा।

हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के सम्बंध में, अमरीका चीन के सहारे पूरे इलाके में उथल पुथल मचाना चाहता है ताकि दक्षिण एशिया के लोग अपने देशों के आर्थिक और राजनीतिक नवीकरण के लिये कदम न उठायें। अमरीका चीन को हिन्दोस्तानी और पाकिस्तानी हुक्मरानों के साम्राज्यावादी मंसूबों का मुकाबला करने के लिये इस्तेमाल करना चाहता है। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने यह अंदाज़ा लगा लिया है कि जब तक हिन्दोस्तान और पाकिस्तान अंदरूनी और बाहरी उथल-पुथल की हालत में होेंगे, जब तब इन देशों के मजदूर-मेहनतकश असंगठित और भूले भटके रहेंगे, तब तक दक्षिण
एशिया में अमरीकी हित बेरोक पनपते रहेंगे।

चीन के इरादे

चीनी नेता खुद एशिया व दुनिया में एक बड़ी ताकत बनना चाहते हैं, पर लोगों के इंकलाबी मुक्ति संघर्षो को कुचलने की चाहत में अमरीका से मिले हुये हैं। ऐसा लगता है कि अभी वे अमरीका की योजनाओं से सहमत हैं। इस समय चीनी नेता तिब्बत तथा तायवान पर कब्ज़ा करने में व्यस्त हैं। वे अपनी आर्थिक और फौजी ताकत को मजबूत करने में व्यस्त हैं। इसके लिये उन्होंने पश्चिमी देशों से, खास तौर पर अमरीका से आर्थिक और फौजी मदद मांगी है और अभी भी इसी रास्ते पर कुछ देर तक चलना चाहते हैं। वे अपनी दक्षिण एशिया व पूर्वी एशिया नीति को अमरीका के साथ मिलकर चलाने के बारे में काफी उत्साहित हैं, ताकि हिन्दोस्तान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, जापान या रूस से चुनौतियों का सामना कर सकें और इस इलाके के इंकलाबी आन्दोलनों को कुचल सकें।

अगर अमरीका और चीन के बीच, हिन्दोस्तान के बारे में कोई समझौते हो, तो यह हिन्दोस्तान के मामलों मेें हस्तक्षेप होगा। और हिन्दोस्तान के लोगों के खिलाफ़ एक उकसाहट होगा। दक्षिण एशिया को बड़ी ताकतों की आपसी स्पर्धा का इलाका बना देने से यहां युद्ध का खतरा बढ़ जायेगा, जिसमें बडी ताकतें भी शामिल होंगी और जो इस उपहाद्वीप तथा सम्पूर्ण एशिया की जनता के लिये तबाहकारी होगा।

मजदूर वर्ग की यह जिम्मेदारी है कि तमाम मेहनतकशों के एक इंकलाबी मोर्चे बनाकर इस खतरे को टालने में योगदान दें।

 

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