दक्षिण एशिया पर अमरीकी नीति

दक्षिण एशिया पर अमरीकी नीति

मई में हिन्दोस्तान और पाकिस्तान द्वारा परमाणु परीक्षणों के बाद अमरीकी सरकार ने जो प्रतिबंध लगाये, उन से यह स्पष्ट हो रहा है कि हिन्दोस्तान और दक्षिण एशिया में अमरीकी साम्राज्यवाद के घुसने के उद्देश्य को पूरा करने के लिये वाशिंगटन में एक हिन्दोस्तान पक्षीय दल, और एक हिन्दोस्तान विरोधी दल है, जो देखने में, आपस में अन्तर्विरोधी हैं।

शीत युद्ध के लगभग 5 दशकों तक अमरीका में हिन्दोस्तान और दक्षिण एशिया को “कम्युनिज़्म को सीमित रखने” के नज़रिये से देखा जाता था। शीत युद्ध के बाद की अवधि में अमरीकी नीतिकारों ने अपनी दक्षिण एशिया नीति की दूसरी परिभाषा दी है। परन्तु अभी भी उनका मकसद है साम्राज्यवादी घुसपैठ, ताकि यह इलाका अमरीकी प्रभाव क्षेत्र में पूरी तरह आ जाये, अमरीकी पूंजी के लिये सुनिश्चित बाज़ार और अमरीकी संसाधनों का सुनिश्चित स्रोत बन जाये।

शीत युद्ध के खत्म होने के समय से अमरीका एकमात्र अपनी ही अधीन एक-ध्रुवीय दुनिया का सपना देख रहा है। परन्तु जब कि दूसरे विश्व युद्ध के ठीक बाद अमरीका ने पश्चिमी यूरोप और दक्षिण अमरीका में अपनी आर्थिक ताकत के आधार पर घुसने के लिये मार्शल प्लैन और मानरो सिद्धान्त शुरू किया था, अब अमरीका के पास वह
धन-संसाधन नहीं है जिसके जरिये वह एक- ध्रुवीय दुनिया के अपने सपने को साकार बना सके। इन हालतों में अमरीका एक तरफ, अपनी फौजी ताकत दिखाकर डरा-धमका रहा है और दूसरी तरफ, मुसीबतों में फंसे स्थानों में दखलंदाज़ी कर रहा है, जब तक उसके पास काफी धन-संसाधन इकट्ठे न हो जायें। “परमाणु विस्तार रोकना,” “दुनिया को और सुरक्षित बनाना,” “आतंकवाद से लड़ना,” नशीले पदार्थों के व्यापार के खिलाफ़ लड़ना” और मानवीय अधिकारों की हिफ़ाज़त करना”, इन नारों के साथ अमरीका अपने प्रसारवादी मंसूबों को बढ़ावा दे रहा है। अंतर्राष्ट्रीय तौर पर अमरीका को कई देशों से चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, मसलन पश्चिमी यूरोप, चीन और रूस, और क्यूबा, लिबिया व उत्तरी कोरिया जिन्होंने “बहुदलीय लोकतंत्र” और “बाज़ारू अर्थव्यवस्था” के
नुस्खों को मंजूर नहीं किया है।

अमरीका का एक-ध्रुवीय दुनिया का सिद्धान्त, चीन का बहु-ध्रुवीय दुनिया का सिद्धान्त जिसका रूस ने समर्थन किया है, ये सारे दिखाते हैं कि अन्तर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोध तेज़ हो रहे हैं और तीसरे विश्व युद्ध की संभावना है। इन अन्तर्विरोधों की जड़ अमरीका की यह मांग है कि सारी दुनिया के बाजार और कच्चे माल, चीन और रूस के भी, अमरीकी कंपनियों द्वारा शोषण के लिये खुला छोड़े जायें। रूस, चीन, जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रंास अमरीका के साथ सहयोग भी करते हैं और टकराते भी हैं, क्योंकि वे सभी दुनिया में अपने-अपने “प्रभाव क्षेत्र” बनाने में लगे हुये हैं और अमरीकी हुक्म उन्हें मंजूर नहीं है। अमरीकी नीति को इस लड़ाई को मानना पड़ता है। इसलिये अमरीका इन झगड़ों के दायरे के अन्दर अपने हितों के लिये हैवानी ढंग से झगड़ता है। परन्तु अमरीका का सबसे कठोर हमला दुनिया भर के लोगों के आज़ादी संघर्षों के खिलाफ़ होता है।

अमरीकी दखलंदाजी के जरिये इंकलाब को कुचलना अमरीकी प्रसारवादी नीति का केन्द्र बिंदु है। अमरीकी आधिपत्य के क्षेत्र का विस्तार करने के अलावा, आज़ादी संघर्षों पर ये हमले उस दिन को और दूर कर देते हैं जब बड़ी साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया को आपस में बांटने के लिये सीधे तौर पर एक दूसरे से टकरायेंगी।

अमरीकी सरकारी सूत्रों के अनुसार, कम्युनिज़्म को सीमित रखने की नीति यूरोप और
दक्षिण अमरीका में सफल रही परन्तु एशिया में असफल थी। इसकी वजह यह थी कि

Û अमरीकी फौज को वियतनाम, कामपुचिया आदि के आज़ादी संघर्षो का सामना करना पड़ा और दक्षिण पूर्वी एशिया से हटाना पड़ा

Û “चीन को सीमित रखने” की अमरीकी नीति के बावजूद, चीन एशिया में अमरीकी आधिपत्य को चुनौती देने वाली एक बड़ी ताकत बन गई है।

इसके अलावा; एशिया में जन संघर्षों की संख्या बढ़ती जा रही है और कई एशियाई देशों में इंकलाब की अच्छी संभावना है।

एशिया के देशों के जन संघर्षों को कुचलने के लिये अमरीका “बहुदलीय लोकतंत्र” और “मुक्त बाज़ार सुधारों” को बढ़ावा देने में सबसे आगे है। पिछले 7 सालों में अमरीका ने पूर्व में अमरीकी-जापानी गठबंधन को मजबूत करने और पश्चिम में नेटो की जाल को फैलाने के लिये हमलावर तरीके से हरकतें की है। यूरोपीय मैदान-ए-जंग से दूर, बाल्कंस और फारस की खाड़ी में, नेटो फौज लड़ाकू तैयारी के साथ तैनात खड़ी हैं। अमरीका दक्षिण एशिया में “सक्रिय दखलंदाजी” की नीति अपना रहा है। किसी न किसी बहाने से, इस इलाके मंे सीधे तौर पर घुसना अमरीका का इरादा है।

अमरीकी उद्योगपतियों के बीच दक्षिण एशिया के प्रति अन्तर्विरोधी रवैये देखने में आ रहे हैं। अमरीकी नीतिकार इस बात पर एकमत रखते हैं कि दक्षिण एशिया में आर्थिक और फौजी तौर पर घुसने से अमरीका के इरादे पूरे होंगे। अमरीकी पूंजी हिन्दोस्तान में सरकार के जरिये घुसती है, और अलग अलग प्रांतो के पंूजीपतियों के जरिये सीधे पूंजी निवेश से तथा संयुक्त कारोबारों से भी। इस इलाके में लगातार झगड़े भड़काकर और डर फैलाकर, अमरीका दक्षिण एशिया को अपने हथियारों और फौजी उपकरणों के लिये एक स्थायी बाज़ार बनाने के लिये सक्रियता से काम कर रहा है। बंगलादेश ने भी खुल्लमखुल्ला कहा है कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के परमाणु परीक्षणों के बाद वह अमरीका के साथ अपने सुरक्षा सम्बंध का “फिर से मूल्यांकन” करेगा। जब यह देखा जाता है कि बाल्कंस और फारस की खाड़ी में अमरीका स्थानीय सहायक मुल्कों के जरिये कैसे अपनी हरकतें करता है, तो बंगलादेश का “फिर से मूल्यांकन” करना काफ़ी खतरनाक लगता है। चीन और रूस की ओर अमरीकी नीति को दक्षिण एशिया की ओर अमरीकी नीति में शामिल किया जा रहा है।

इन सभी मामलों में, अमरीकी हुक्मरानों के बीच मतभेद है कि अंदर से घुसपैठ करने की नीति और बाहर से घेरने की नीति के बीच सामंजस्य कैसे लाई जाये। व्यापार में “सबसे अनुग्रहीत राष्ट्र” (एमÛएफÛएनÛ) का दर्जा देकर, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक
द्वारा उधार और सहायता पैकेज के जरिये, अमरीका की हिफ़ाज़त करने वाले अंदरूनी दलों को खुलेआम और गुप्त समर्थन देकर इन सभी देशों में आर्थिक तौर पर घुसने का बुलावा अमरीका में विभिन्न्ा दलों के बीच तेज़ वाद-विवाद पैदा कर रहा है। वाशिंगटन में “हिन्दोस्तानी पक्षीय” और “पाकिस्तान पक्षीय” दल इन मुद्दों पर हर रोज़ अपने हितों को बढ़ावा देते हुये “खबरें” छाप रहे हैं। इन ”खबरों” को अगर ध्यान से देखा जाये तो यह समझ में आता है कि दक्षिण एशिया में साम्राज्यवादी कब्ज़े की अमरीकी नीति इस उपहाद्वीप में कैसे चलाई जा रही है। चुपचाप, अमरीका इन में से हरेक देश में अपने एजेंट तैयार कर रहा है और साइबेरिया, ग्वेंगज़ाऊ या आंध्र प्रदेश जैसे दूर-दराज के देशों में स्थानीय पूंजीपतियों से गठबंधन बना रहा है, जब कि नेटो, सेवेन्थ फलीट और दूर पूर्व में अमरीकी मोर्चे बाहर से अपना काम कर रहे हैं। हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के परमाणु परीक्षणों के जवाब में अमरीका ने ऐलान किया है कि वे इन देशों की सरकारों को कोई पूंजी नहीं देगा, परन्तु निजी पूंजीपतियों को पूंजी मिलती रहेगी।

हिन्दोस्तान, इंडोनेशिया, चीन व दूसरे देशों समेत एशिया पर आधिपत्य जमाने में अमरीका सबसे आगे है। हिन्दोस्तान, पाकिस्तान और बाकी एशिया के लोगों के लिये भविष्य का दृश्य काफ़ी खतरनाक महसूस होता है। हिन्दोस्तान के मजदूर वर्ग और सभी आजादी पसंद व शान्ति पसंद लोगों को अमरीकी नीति का ज़ोरदार विरोध करना चाहिये, चाहे यह आर्थिक और फौजी तरीकों से लागू की जा रही हो या देश में घुसपैठ करके। और यदि हमारे हुक्मरान इस नीति से समझौता करना चाहें तो उनका डटकर विरोध करना चाहिये।

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