पूंजीवाद की अमिट भूख

पूंजीवाद की अमिट भूख

साम्राज्यवाद के युग में पूंजीवाद की यह विशेषता है कि उत्पादन और पूंजी दोनों का अधिक से अधिक केन्द्रीयकरण होता है, जिसकी वजह से छोटे उद्योग या तो खत्म हो जाते हैं या बड़े उद्योगों में मिल जाते हैं। ये बड़े पूंजीवादी उद्योग अपने हाथों में बहुत सारी उत्पादक क्षमता, ऊर्जा और कच्चे माल इकट्ठे कर लेते हैं।

वीÛआईÛ लेनिन ने कहा है कि“…… आम तौर पर उत्पादन के केन्द्रीकरण की वजह से इजारेदारों का बनना पंूजीवाद के विकास के वर्तमान स्तर का व्यापक और बुनियादी कानून है।”

इन विशाल उद्योगों का राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय रूप होता है। अपने देश में वे छोटे उद्योगपतियों को तबाह कर देते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वे विशाल उद्योग बन जाते हैं और बहुत से देशों में पूरे उद्योग, खेती, निर्माण आदि पर अपना नियंत्रण जमाते हैं।

हिन्दोस्तान में भी ऐसी ही हालत है, जहां पंूजीवाद हिन्दोस्तान में तेज़ी से बढ़ता रहा है, और अर्थव्यवस्था की विभिन्न शाखाओं पर अपनी पकड़ बढ़ा रहा है। छोटी कंपनियों को खरीदकर या अपने साथ मिलाकर, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की विभिन्न पूंजीवादी कंपनियां जो हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजी से बनी हुई थीं, अब दुनिया में इजारेेदार बन गई हैं और देश की मेहनत व कुदरती संसाधनों के मालिक बन गये हैं। देश के उत्पादन का काफी बड़ा हिस्सा उनके नियंत्रण में है।

एमÛआरÛटीÛपीÛ और फेरा के रद्द हो जाने से यह इजारेदारीकरण की प्रक्रिया और तेज़ हो गई है। इसके शिकार सिर्फ छोटे और मध्यम उद्योग ही नहीं बल्कि बड़े वित्तीय संस्थान और दल भी हैं। अधिक से अधिक मुनाफों की इजारेदारों की अमिट भूख और अंतर्विरोधों के तेज़ हो जाने से यह प्रक्रिया बहुत बढ़ गई है। हाल ही में, ब्रुक बांड, लिप्टन और पांड्स हिन्दुस्तान लीवर के साथ मिल गये, दक्षिण भारतीय इजारेदार इंडिया सिमेंट्स ने रासी सिमेंट पर कब्जा कर लिया, टाटा ग्रुप के इंडियन होटल्स द्वारा कई छोटे होटलों पर कब्ज़ा करने की कोशिश की गई, एÛवीÛ बिरला ग्रुप ने श्री दिग्विजय सिमेंट पर कब्ज़ा करने की कोशिश की, इत्यादि।

छोटी और मध्यम कंपनियां सीधे तौर पर, इन इजारेदारों पर निर्भर हैं। वे इजारेदारों से आदेश लेते हैं, उनके लिये काम करते हैं, उनसे उधार लेते हैं, कच्चे माल व तकनीक विद्या उनसे पाते हैं।

उत्पादन और पूंजी के इजारेदारीकरण से पंूजीवाद का बुनियादी अंतर्विरोध और बढ़ गया है, उत्पादन के सामाजिक रूप और मुनाफे कमाने के निजी रूप के बीच अंतर्विरोध बहुत तेज़ हो गया है। हिन्दोस्तान में मजदूरों के खंूख्वार शोषण से प्राप्त अत्यधिक मुनाफे कुछ मुट्ठीभर पूंजीपतियों की जेबों में जाता है। इसी प्रकार, उत्पादन के साधन पूंजीपतियों की निजी सम्पत्ति है, जबकि मजदूर वर्ग उनका गुलाम है और श्रम शक्ति एक बिकाऊ वस्तु है।

1997-98 में 590 कंपनियों (सार्वजनिक व निजी क्षेत्र) के मुनाफे उस साल के लिये शिक्षा, खेती स्वास्थ्य, देहाती रोज़गार, महिला और शिशु विकाश व कल्याण मंत्रालयों की पूरी बजट से 40 प्रतिशत ज्यादा थे। उसी साल, निजी क्षेत्र की 1,262 कंपनियों के मुनाफे 7,161 करोड़ रुपये थे। 1996 में, बाज़ार की सबसे बड़ी 1,100 कंपनियों की बिक्री 2.91 लाख रुपये थी, जो कि देश के पूरे उत्पादन का लगभग 30 प्रतिशत था। सबसे बड़ी दस कंपनियों ने 48.6 प्रतिशत बिक्री की। इन आंकड़ों से पता चलता है कि इन बड़ी कंपनियों में कितना उत्पादन और पूंजी केन्द्रित है।

”कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र“ से

प्रस्तुत उद्धरण में कार्ल माक्र्स और फ्रेडरिक एंगल्स यह समझाते हैं कि आर्थिंक संकट सरमायदारी व्यवस्था के हमसफर हैं, कि बड़े पैमाने पर किया गया आधुनिक उत्पादन तथा इस उत्पादन को करने वाला सर्वहारा वर्ग ही सरमायदारी व्यवस्था को खत्म करेगा।

आधुनिक सरमायदार समाज उत्पादन, लेनदेन व जायदाद के संबन्धों समेत, विशाल उत्पादन व लेनदेन के साधनों वाला एक ऐसा समाज बन गया है जो उस जादूगर की तरह है, जो अपने जादू द्वारा बुलाई गई भयानक ताकतों को काबू में नहीं रख पा रहा है। पिछले कुछ दशकों से उद्योग और व्यापार का इतिहास आधुनिक उत्पादक ताकतों की बगा़वत का इतिहास रहा है, आधुनिक उत्पादन की हालतों के खिलाफ़, उन जायदाद के सम्बंधों के खिलाफ़ जो सरमायदारों और उनकी हुकूमत की मौजूदगी की हालतें हैं। उन औद्योगिक संकटों का ज़िक्र करना ही काफ़ी होगा, जो बार बार वापस आकर, और हर बार ज्यादा डरावने ढंग से, सम्पूर्ण सरमायदार समाज की मौजूदगी को कटघरे में खड़ा कर देता है। इन संकटों में वर्तमान उत्पादों का ही नहीं बल्कि पहले पैदा की गई उत्पादक ताकतों का भी बहुत बड़ा हिस्सा नष्ट किया जाता है। इन संकटों में एक ऐसी महामारी फैल जाती है जो बीते युगों में शायद पागलपन लगता-अत्यधिक उत्पादन की महामारी। समाज अचानक अपने आप को कुछ समय के लिये बर्बरता की हालत में पाता है। ऐसा महसूस होता है कि कोई अकाल पड़ गया है या तबाहकारी जंग हुआ है, जिससे जीवन के सभी साधनों के स्रोत कट गये हैं, कि उद्योग और व्यापार नष्ट हो गये हैं, और क्यों? क्योंकि अत्यधिक सभ्यता है, अत्यधिक जीवन के साधन हैं, अत्यधिक उद्योग, अत्यधिक व्यापार हैं। समाज की उत्पादक ताकतें सरमायदारी सम्पत्ति की हालतों को और विकसित नहीं करतीं; बल्कि इसका उलटा होता है। समाज की उत्पादक ताकते उन्हें रोकने वाली हालतों के लिये ज्यादा शक्तिशाली बन जाती हैं। और जैसे ही उत्पादक ताकतें अपनी रुकावटों को दूर कर देती हैं, वैसे ही वे पूरे सरमायदारी समाज को अस्तव्यस्त कर देती हैं और सरमायदारी समाज की मौजूदगी के लिये एक खतरा बन जाती हैं। सरमायदारी समाज की हालतें उसके द्वारा पैदा किये धन को सीमित रखने के लिये ज्यादा तंग हो जाती हैं। और सरमायदार इन संकटों पर कैसे काबू पाता है? एक तरफ, उत्पादक ताकतों का सामूहिक विनाश करके और दूसरी तरफ, नये बाजारों पर कब्जा करके व पुराने बाजारों का और शोषण करके। यानि कि, और व्यापक व तबाहकारी संकट की हालतें पैदा करके तथा संकट रोकने के साधनों को और कम करके।

जिन हथियारों से सरमायदारों ने सामंतवाद को गिराया था, वे हथियार अब सरमायदारों के ही खिलाफ़ हो गये हैं। परन्तु सरमायदारों ने खुद अपना विनाश करने वाले सिर्फ हथियार ही पैदा नहीं किये हैं, बल्कि इन हथियारों को चलाने वालों को भी पैदा किया है-आधुनिक मजदूर वर्ग, यानि सर्वहारा वर्ग।

 

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