प्रभुसत्ता और अर्थव्यवस्था

प्रभुसत्ता और अर्थव्यवस्था

हमारी अधिकतम जनता भूखी, बीमार और बेघर है। पर वे इन असहनीय हालतों को और बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं। देश के सभी उत्पादक संसाधनों से जो अतिरिक्त धन पैदा होता है, वह मुट्ठीभर लोगों के हाथों में है। राज्य तंत्र समाज द्वारा उत्पादन किये गये इस अतिरिक्त धन को हड़प लेता है और फिर उसे इन मुट्ठीभर शोषकों के हाथों सौंप देता हैं। आज यह जरूरी है कि हमारी जनता के हाथों में प्रभुसत्ता रहे, ताकि समाज के संसाधनों पर वे अपना हक जता सकें और मनुष्य की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिये उनका इस्तेमाल कर सकें।

धन का उत्पादन और इस्तेमाल, यही अर्थव्यवस्था है। इंसान के श्रम और कुदरत के बीच पारस्परिक कार्यवाही से धन का उत्पादन होता है। हिन्दोस्तान में बस्तीवादी हुकूमत लागू होने से पहले, राजा और उनके अफसर गांवों से राजस्व कर इकट्ठा करते थे और गांव आम तौर पर आत्मनिर्भर होते थे। इस प्रकार, धन का उत्पादन, संचय और वितरण राजा के संग्राहकों और किसानों के बीच सम्बंध के आधार पर होता था।

किसी भी राज्य का विकास इस बात पर निर्भर होता था कि वह कितनी कुशलता से राजस्व इकट्ठा करता था और उसे सिंचाई, सड़क बनाना, राज्य की सुरक्षा, इत्यादि के लिये इस्तेमाल कर पाता था। उत्पादक संसाधनों की मिलकियत इस प्रकार थी कि राजा और ब्राह्मण हर गांव या आदिवासी जाति द्वारा उत्पादित अतिरिक्त धन को हड़प लेते थे। जनता की बग़ावत के डर से, “अर्थशास्त्र” और हिन्दोस्तानी राज्यतंत्र पर दूसरी रचनाओं में यह कहा गया था कि समाज का अतिरिक्त उत्पादन सार्वजनिक सुविधाओं को विकसित करके जनता को “योग-क्षेम” (यानि खुशहाली) और “रक्षा” (यानि शान्ति और सुरक्षा) दिलाने मेें इस्तेमाल होना चाहिये। हिन्दोस्तान मेें केन्द्रित राज्य व्यवस्था के विकसित होने के साथ, राज्य की तिजौरी में काफी धन इकट्ठा हो गया और समाज की प्रगति होती गई।

इतिहास में बार बार विदेशी हमलावरों ने हिन्दोस्तान के धन को लूटने के लिये हमारे मुल्क पर हमला किया। जब जब केन्द्रित राज्य कमजोर हुआ और जनता को सुरक्षा न दिला पाया, सार्वजनिक सेवाओं के जरिये जनता को खुशहाली न दे सका, तब तब हिन्दोस्तानी सभ्यता का पतन हुआ। सदियों, से बार बार हिन्दोस्तान पतन और विघटन से फिर उठ कर आगे आया और एक नया केंद्रित राज्य बना। लोगों को सार्वजनिक सेवायें दिलाना हिन्दोस्तानी सभ्यता की विशेषता रही है।

छोटे गांवों ओर आदिवासी अर्थव्यवस्थाओं के ही आधार पर इतनी ऊंची सभ्यता, जिस पर हर हमलावर की नज़र रहती थी, यह इसलिये मुमकिन हुई क्योंकि राज्यों ने सामाजिक विकास की नीति अपनायी थी।

यूरोपीय व्यापारियों ने हिन्दोस्तान के साथ व्यापार शुरू किया और इसके साथ साथ बस्तीवाद का दौर शुरू हुआ। हिन्दोस्तानी समाज द्वारा पैदा किये गये अतिरिक्त धन को बस्तीवादियों ने बहुत बड़ी मात्रा में निचोड़ लिया। बड़े पैमाने पर मशीनीकृत यातायात और संचार के साधनों के विकसित होेने से हिन्दोस्तानी मेहनतकशों के कुदरती संसाधनों और उत्पादों को पूरा पूरा बस्तीवादियों ने लूटना शुरू कर दिया। धीरे धीरे, बर्वानवी बस्तीवादियों ने अपनी राज्य सत्ता कायम कर ली और हिन्दोस्तान से अधिक से अधिक धन निचोड़ने के लिये नये किस्म के आर्थिक संगठन बनाये। 19 वीं सदी में जब उन्होंने हिन्दोस्तान में केन्द्रित राज्य बनाया, तो उनका उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं द्वारा जनता को खुशहाली दिलाना नहीं था, बल्कि हिन्दोस्तान की सम्पत्ति की अधिकतम लूट सुनिश्चित करना था।

हिन्दोस्तान में जब पूंजीवाद की शुरुआत हुई,तो बड़े पैमाने पर मानवीय और कुदरती संसाधनों को लूटा जाने लगा। बीते दिनों में राजा के अफसर किसानों और कारीगरों के उत्पादन का कुछ हिस्सा ले लेते थे। पर अब उत्पादक का पूरा उत्पादन एक विदेशी ताकत छीन लेती थी, इस वजह से कि वह उत्पादन के साधनों का नया मालिक बन चुका था। अत्यधिक लूट और शोषण के अलावा इस विदेशी ताकत का और कोई काम न था। शुरु से ही, मेहनतकशों को निचोड़ा गया। गरीबी इतनी बढ़ी, जितनी कि इतिहास में पहले कभी न हुयी हो। देहातों से शहरों को आने वाले मजदूरों को वह इज़्ज़त फिर कभी न मिली जो पुराने हिन्दोस्तानी वर्गीकृत समाज में भी उन्हें मिलती थी। 19 वीं सदी के भयानक अकाल और शहरों में मजदूर वर्ग इलाकों की दर्दनाक गरीबी इसके मिसाल बनें। किसानों को भी पूंजीपति वर्ग ने खूब निचोड़ा। अपनी दयनीय हालतों की वजह से मजदूर वर्ग आधुनिक बड़े पैमाने पर किये गये उत्पादन से पैदा किये गये अतिरिक्त धन के आधार पर, जनता को खुशहाली और सुरक्षा दिलाने वाले एक नये समाज का निर्माण न कर पाया। परन्तु मजदूर वर्ग और किसान समाज की सबसे उत्पादक ताकतें और सबसे बड़ी संख्या की ताकतें बन गयीं। पूंजीवाद ने इन दोनों वर्गों को निचोड़ कर इनकी किस्मत एक साथ बांध दी। और इन्हीं के कंधों पर पड़ा नया समाज बनाने की जिम्मेदारी।

बड़े पैमाने पर पूंजीवादी उत्पादन की शुरुआत के साथ हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था हमेशा के लिये बदल गई। पूंजीवाद के साथ जो राज्य सत्ता बनी, वह नये किस्म की राज्य सत्ता थी, जो ऊपर से जनता पर हुक्म चलाती थी। समाज के बुनियादी स्तर पर राज्य सत्ता बिल्कुल नष्ट कर दी गयी। इस नई राज्य सत्ता ने समाज से जो धन लूटा, इसका कोई हिस्सा जन कल्याण के लिये, जनता को खुशहाली और सुरक्षा देने के लिये नहीं इस्तेमाल किया गया। इस प्रकार, पूंजीवाद ने एक ओर गरीबी और दूसरी ओर अमीरी पैदा किया। नई राज्य सत्ता ने इस व्यवस्था को कायम किया। पूरे समाज के लिये रोजी रोटी का संघर्ष एक दैनिक संघर्ष बन गया। मजदूर वर्ग, जो बड़े पैमाने पर धन का उत्पादक होने की वजह से समाज के सबसे आधुनिक और अगुवा ताकत के रूप में उभर कर आया, वह अपनी बुनियादी जरूरतों की लड़ाइयों में फंसा रह गया। इसीलिये, मजदूर वर्ग द्वारा पैदा किया गया बेशुमार धन हिन्दोस्तानी समाज को सुख और रक्षा दिलाने के लिये प्राप्त न हो सका।

अब वह वक्त आ गया है कि हिन्दोस्तान का आधुनिक मजदूर वर्ग अपना ऐतिहासिक फ़र्ज निभाये। उसे पूरे समाज को अगुवाई देना हैं, जनता के हाथ में प्रभुसत्ता हासिल करने के लिये, सभी संसाधनों को जनता के हाथों में लाने के लिये, ताकि हिन्दोस्तानी समाज को अपने वर्तमान हालत से तब्दील करके प्रगति, खुशहाली, लोकतंत्र और शन्ति के रास्ते पर लाया जा सके।

अगर लोगों के हाथों में प्रभुसत्ता हो तो वे अर्थव्यवस्था के अतिरिक्त धन को चंद औद्योगिक घरानों, बहुराष्ट्रिक कंपनियों और बैंकों द्वारा हड़पे जाने से रोक सकते हैं। बस्तीवादी और साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ़ अपने लंबे संघर्ष के इतिहास में मजदूर वर्ग और मेहनतकश एक नया अध्याय तब लिखेंगे जब वे अपनी राज्य सत्ता कायम करके इस अतिरिक्त धन को सार्वजनिक सेवाओं में डालेंगे, और आधुनिक तरीके से जनता को खुशहीली और सुरक्षा दिलायेंगे। हिन्दोस्तानी मजदूर वर्ग यह ऐलान करेगा कि देश के हर कोने में संसाधनों का अधिकतम विकास किया जायेगा, और इससे पैदा होने वाले अतिरिक्त धन को समाज की सब तरफा प्रगति के लिये इस्तेमाल किया जायेगा। यह एक
योजनाबद्ध ढंग से किया जायेगा और बहुराष्ट्रिक कंपनियों व अंतर्राष्ट्रीय साहूकारों के षड्यंत्रों को नाकामयाब किया जायेगा।

हिन्दोस्तानी मजदूर वर्ग सभी उत्पादक संसाधनों का इस्तेमाल करके जनता को खुशहाली और सुरक्षा दिलायेगा और रास्ते में आने वाले सभी निहित स्वार्थों को हटा देगा। इन उत्पादक संसाधनों को लोगों ने पैदा किया है पर अब तक निजी स्वार्थ वालों ने उसे लोगों से छीन लिया है। मजदूर वर्ग की राज्य सत्ता का सबसे महत्वपूर्ण काम होगा शहरों व देहातों से गरीबी दूर करना। समाज के सभी संसाधनों को इस काम में लगाया जायेगा। हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था में सबसे उत्पादक तत्व, यानि इंसान, नष्ट हो रहा है। मजदूर वर्ग का तजुर्बा यही बताता है कि भूखे इंसान पूंजीपति वर्ग के लिये एक बीमा है, मजदूरों को श्रम के गुलाम बनाये रखने और पूरी जनता को भुखमरी व कंगाली की स्थिति में बंधुआ रखने के लिये। मजदूर वर्ग की सबसे पहली मांग यह है कि समाज के सभी मानवीय और भौतिक संसाधनों का इस्तेमाल करके घर-बार, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा आदि की कमी, और भूख को हिन्दोस्तान से मिटा दिया जाये। लोगों को उत्पादक काम में लगाने की योजना बनाकर ऐसा किया जा सकेगा। परन्तु जब तक भूख,
निरक्षरता, गरीबी आदि नहीं दूर होती, तब तक विदेशी कंपनियों के कर्जे चुकाने में कोई पैसा नहीं खर्च होना चाहिये। मजदूर वर्ग और किसान अपनी ही मेहनत से समाज के लिये दौलत पैदा करते हैं और वे यही चाहते हैं कि इस दौलत से समाज की हालत सुधारी जाए।

प्रभुसत्ता ही वह साधन है जिसके जरिये हिन्दोस्तानी समाज का अतिरिक्त धन योग क्षेम (खुशहाली) और सुरक्षा के लिये इस्तेमाल हो सकता है। इसलिये समाज को खुशहाली और सुरक्षा दिलाने के काम पर धन लगाने के लिये संघर्ष ही प्रभुसत्ता के लिये संघर्ष है।

 

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