मजदूरों की जिंदगी की ओर लापरवाही

मजदूरों की जिंदगी की ओर लापरवाही

दिसंबर 1984 मंे भोपाल में यूनियन कारबाइड फैक्टरी से ज़हरीले गैस रिसन के कारण लगभग 2 लाख लोग मरे तथा कई हजारों और लोग घायल हुये या बीमार पड़े थे। उसके बाद, पिछले 14 सालो में बहुत से बडे़ व छोटे उद्योगों में लाखों मजदूरों व गरीब औद्योगिक दुर्घटनाओं के शिकार बनते आये हैं। हजारों मारे गये हैं, तो कई सैकड़ों और घायल हुये या बीमार पड़े है। निम्नलिखित तालिका में कुछ मुख्य औद्योगिक दुर्घटनाओं का विवरण हैं:-

इन मुख्य हादसों के अलावा, लगभग हर रोज देश के किसी न किसी कोने में छोटी या बड़ी औद्योगिक दुर्घटना होती रहती हैं। वहां काम करने वाले मजदूर तो मारे जाते या घायल होते ही हैं, आस-पास काम रहने वाले हज़ारों और लोग भी जहरीले गैस संूघने से या आग इत्यादि से पीड़ित होते हैं या मारे जाते हैं। मिसाल के तौर पर, 1994 में मालानंदा आग विस्फोट में 76 मरे और 26 घायल हुये; 1990 में बारीपद उड़िसा में ओलियम गैस रिसन से 140 मरे; गनौर, पटियाला में 1990 में आग से 58 मरे; गंजम में 1990 में जहरीले गैस से 10 मरे; मुज़्ज़्ाफरपुर सलफ्यूरिक एसिड आग से 1995 में 24 घायल हुये; महाराष्ट्र के ठाणे और पुणे में 10 सालों में 7-8 औद्योगिक दुर्घटनाओं में सैकड़ों लोग मरे; मंुबई में 10 सालों में 13 औद्योगिक दुर्घटनायें हुई; जमशेदपुर में 1988 और 1990 में तथा कई और इस्पात उद्योग संबन्धी दुर्घटनाएं हुई।

दिल्ली शहर में ही देखा जाये, तो 1989 में जहरीले गैस रिसन की वजह से 15 लोग मरे। 1993 में पोलीवाइनिल क्लोराइड कोटिंग की फैक्टरी में आग लगी और विस्फोट हुआ। 1994 में नाइट्रो सेल्यूलोस विस्फोट और आग से एक मरा व 10 आहत हुये। 1994 में एक और औद्योगिक आग ने 14 जानें ले लीं।

शहरों में जहां जहां उद्योग लगाये जातें हैं, वहां काम करने वाले मजदूर और उनके परिवार मुख्यतः फैक्टरी के आस पास इलाके में ही झुग्गियों में रहते हैं। गांव में गरीबी के कारण वे अपनी जमीन आदि छोड़कर, शहरों में आकर नौकरी करने तथा अत्यन्त दयनीय हालतों में झुग्गियों में रहने को मजबूर होते हैं। इन जगहों में अक्सर हजारों-हजारों लोग बहुत ही छोटे इलाके के अन्दर रहते हैं। इसलिये कोई भी औद्योगिक दुर्घटना होने पर, जहरीले गैस रिसन या आग लगने पर, क्षण भर में हजारों लोग मर सकते हैं या बुरी तरह घायल हो सकते हैं।

परन्तु यह खतरा जानते हुये भी उद्योगपतियों और उनकी सांठ-गांठ में सरकार को मजदूरों की जिन्दगी की कोई परवाह नहीं है। तभी तो ऐसे हादसे बार बार होते रहते हैं। उद्योगपतियों और फैक्टरी मालिक इन दुर्घटनाओं के लिये कभी भी अपनी जिम्मेदारी नहीं स्वीकार करते। सरकारी अफसरों और वकीलों को पैसा खिलाकर वे बच जाते हैं और पूरी सुरक्षा इंतजामों के बगैर ही, सिर्फ अपने अधिकतम मुनाफों के लिये, फैक्टरी चलाते रहते हैं। और सरकार उनके कारनामों से मुंह फेर लेती है।

पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूर तो सिर्फ पूंजीपतियों के मुनाफे़ बढ़ाने के लिये सस्ती मजूरी माने जाते हैं, उन्हें इंसान की कद्र भी नहीं दी जाती।

औद्योगिक दुर्घटनाओं से मारे गये या पीड़ित मजदूरों और उनके परिवारों के प्रति सरकार और पूंजीपतियों के रवैये की सबसे ज्वलंत खुदगवाही शायद यह है कि 14 साल बाद, भोपाल गैस त्रासदी में मरे दो लाख से अधिक लोगों के अनाथ परिवार तथा कई हजा़र प्रभावित परिवार आज भी इंसाफ़ की मांग लेकर न्यायालयों के दरवाज़े खटखटा रहे हैं।

किसान संघर्ष समिति का संघर्ष का ऐलान

हरियाणा किसान संघर्ष समिति ने 1 जुलाई को सिरसा के शहीद उधम सिंह पार्क में धरना दिया तथा एक जनसभा की। इसमें एक हजार से ज्यादा किसानों व उनके समर्थकों ने भाग लिया। इसकी अध्यक्षता काÛ लेखराज कर रहे थे। इन्होंने अपने भाषण में कहा कि “हम आन्ध्र प्रदेश व कर्नाटक के किसानों की तरह आत्महत्या नहीं बल्कि
आखिरी दम तक संघर्ष करेंगे”। इन्होंने सरकार से सही वोल्टेज़ पर अधिक बिजली देने की मांग की। इनके बाद काÛ सुखदेव ने सरकार से मांग की कि हमें रोज़ाना 10-12
घंटे बिजली उपलब्ध कराई जाए। फिर काÛ जयचन्द ने अपने भाषण में सरकार से मांग की कि सिरसा जिला को भी कुरूक्षेत्र व करनाल की तरह धान वाला जिला घोषित किया जाए तथा उसी आधार पर इस जिले को बिजली उलब्ध कराई जाए। अन्य वक्ताओं मंे से एक और मांग आई कि बाजार में जो दुकानदार घटिया नकली खाद व बीज बेच रहे हैं उनके खिलाफ़ कार्यवाई की जाए। भारी वर्षा के कारण काफी किसान सही समय पर पहुंच नहीं पाए पर इसके बावजूद जो यह जनसभा हुई वह किसानों के मजबूत इरादों को दर्शाती है। भारी वर्षा में उधम सिंह पार्क से बिजली घर तक जुलूस निकाला गया तथा बन्सी साल के पुतले को दो गैलन मिट्टी का तेल डालकर जलाया गया। सरकार के प्रति उनका गुस्सा देखते ही बनता था जो एकदम जायज़ है।

रेलवेे तकनीकी कर्मियों का प्रदर्शन

रेलवे तकनीकी कर्मचारियों के शोषण के खिलाफ टेक्नीकल इम्पलाइज एसोसिशन आफ रेलवेज (टीयर) ने बड़ौदा हाउस पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए टीयर के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि 1 मई 1998 को टूल डाउन हड़ताल में शामिल तकनीकी कर्मचारियों को अधिकारियों द्वारा तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्होंने ग्रुप डी तकनीकी कर्मचारियों हेतु वेतन आयोग द्वारा 3050-4590 रुपये वेतनमान की सिफारिशों को लागू न किये जाने पर रोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यदि शोषण बंद नहीं हुआ तो वे पुनः आंदोलन करने को बाध्य होंगे।

 

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