महंगाई के विषय मंे प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र

महंगाई के विषय मंे प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र

आदरणीय प्रधानमंत्री जी

इस पत्र के द्वारा हम आपसे एक खास सवाल पूछना चाहते है। आपने और आपकी पार्टी ने यह दावा करते हुए सरकार बनाया था, कि आप इस देश में “राम राज्य” को प्रतिष्ठित करेंगे। क्या “राम राज्य” की व्यवस्था का मतलब यह है कि यहां के मजदूर मेहनतकश लोगों को पेट भर खाना भी नहीं मिलेगा और उनका दैनिक जीवन स्तर रोज़ घटता जाएगा, यहां तक कि जो लोग मुश्किल से रोज़ थोड़ा बहुत सब्जी़ दाल भी खाया करते थे, उन चीजों को भी उनके हाथ के बाहर कर दिया जाएगा?

जबकि आप और आपकी पार्टी रोज़ अपनी कुर्सी को बचाए रखने के प्रयास में डूबे हुए रहते हैं, और बड़े सरमायादारों की सेवा करने में ही अपने दिलोदिमाग को लगाए हुए रहते हैं, तो दूसरी तरफ यहां महंगाई का बोझ आम लोगों के ऊपर दिन दुगुना चैगुना रात होते हुए बढ़ रहा है। हम यह महसूस कर रहे हैं कि दिन भर के कठिन मेहनत, असहनीय गर्मी तथा पानी और बिजली के अभाव-इन सब के बाद हमें एक वक्त का खाना तक मिल नहीं पा रहा है। चावल, आटा इत्यादि के दाम तो पहले ही कम न थे, और दालें तो ग़रीब घरानों में दो-दिनों बाद ही बन पाता है, पर अब सब्जियों के भी भाव ऐसे बढ़ रहे हैं कि हमें सूखी रोटी ओर मिर्च की चटनी को खाकर सो जाना पड़ रहा है। हमें यह भी नहीं बताया जा रहा है कि इस महंगाई की क्या वजह है, और इसके बारे में आपकी सरकार क्या क़दम उठा रही है। एक तरफ यह बात मंत्रियों के मंुह से सुनने को मिलता है कि खेतों का फसल बहुत अच्छा मिल रहा है, और यह कि खेत-बागानों के उत्पादन को मुक्त बाज़ार की नितियों के द्वारा प्रोत्साहन दिया जा रहा है, इत्यादि। अगर यह बात है, तो हम लोगों को इन चीजों का फायदा क्यों नहीं मिल पा रहा है? क्या इस देश के मेहनतकशों के खाने को कम करके, और हमारे बच्चों के जरूरी पोषण और आहार में कटौती करवाकर ही उन सरमायदारों की जेबें भरी जाएंगी जो इन नीतियों के पीछे हैं?

आपको यह पता होगा कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक बच्चे को रोज नियमित तौर पर पोषण-युक्त खाना मिलना उसके मूलभूत हकों में से एक ही नहीं है, बल्कि उसके जीवित और तंदुरूस्त रहने का आधार है। आपके कारनामों की वजह से आज आलू-प्याज जैसी मामूली चीजों के भी, जिसे ग़रीब लोग रोज खाना में उपयोग करते हैं, दाम 10-16 रुपये किलो हो गये हैं।

हमारा यह हक बनता है कि हमें सही और पोषण-युक्त खाना मिलें या हासिल करने का साधन हमारे पास हों। बल्कि हम ही इन चीजों के उत्पादक हैं। मेहनतकशों का ही इन चीजों पर पहला आधिकार बनता है। इसे मान्यता न देकर आपने फिर से अपनी सरकार का पूंजीपतियों के सेवक और मेहनतकशों के दुश्मन के रूप में पर्दाफाश किया है, और आपके नारों को एक ढोंग साबित किया है।

रिश्वतखोरी ने दिल्ली में जीना हराम कर दिया

दिल्ली शहर में हर महीने लगभग 300 करोड़ रुपये “हफ्ता” या दूसरे किस्म के रिश्वत से इकट्ठा किया जाता है, ऐसा उपराज्यपाल द्वारा नियुक्त एक जांच टीम ने पाया है। और यह पैसा कौन इकट्ठा करता है? पुलिस और स्थानीय सरकारी अफसर, जिनकी मदद के लिये गुंडे और जगह-जगह के “दादा” भी मौजूद हैं। शहर के हर कोने में, दुकानों-बाजारों में, सड़कों व बस-स्टैंडों के पास, झुग्गियों में, सब जगह यह आम मेहनतकशों को लूटने का सिस्टम मौजूद है।

नगर निगम के इलाके में सड़क के कोने पर एक चार फुट बाई चार फुट पान-बीड़ी बेचने का खोखा लगाने के लिये पहले 50,000 रुपये और फिर प्रति माह 1,500 देना पड़ता है, जो कि नगर निगम के अफसरों और पुलिस की जेबों में जाता है।

दरियागंज और दूसरे बड़े बाज़ार इलाकों में फुटपाथ पर कपड़े, किताब आदि बेचने वाले हर व्यक्ति को किसी जाने माने “दादा” को हर रोज 100 रुपया देना पड़ता है। इसके अलावा पुलिस और नगर निगम के अफसर भी उनसे “हफ्ता” नियमित तौर पर लेते हैं। सिर्फ इंडिया गेट जैसे एक पार्क के पास खड़े आइस क्रीम विक्रेताओं और ठंडे पेय विक्रेताओं से हर दिन कम से कम 25,000 रुपये इकट्ठे किये जाते हैं।

निजी सड़क विक्रेताओं और दुकानदारों के अलावा, जिन्दगी की बुनियादी जरूरतों के लिये भी रिश्वत देनी पड़ती है। दिल्ली विद्युत बोर्ड का अपना गंुडा दल है। झुग्गियों, आवास क्षेत्रों पर चलाये जाने वाले छोटे उद्योगों तथा औद्योगिक क्षेत्रों में, जहां बिजली की सप्लाई जरूरत से कम दी जाती है या दी ही नहीं जाती, वहां गैर कानूनी कनेक्शन व बिजली की चोरी में यह गुंडा दल “मदद” करता है और इस “मदद” के बदले, मेहनतकशों और छोटे उत्पादकों से करोड़ों रुपये कमाते हैं। डीÛडीÛएÛ (दिल्ली विकास प्राधिकरण) के भी अपने ऐसे गुंडे हैं जो गै़र कानूनी निर्माण काम में “मदद” करते हैं। एक-दो कमरे बनवाने के लिये कभी कभी 25 लाख रुपये लिये जाते हैं। इसका 20 प्रतिशत पुलिस को, 20 प्रतिशत नगर निगम के अफसरों को, 20 प्रतिशत स्थानीय नेता को और बाकी 40 प्रतिशत ठेकेदार को जाता है।

आये बरसात के दिन और घेरलू बिजली कनेक्शन या टेलीफोन कनेक्शन खराब हो जाते हैं। इसे ठीक करवाने के लिये हफ्तों या महिनों तक इंतजार करने, विद्युत बोर्ड या टेलीफोन निगम के दफ्तरों के सौ चक्कर काटने के बाद भी मोटे रिश्वत देकर ही काम होता है।

डीÛडीÛएÛ, डीÛवीÛबीÛ, एमÛटीÛएनÛएलÛ, नगर निगम, या पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें या तो इन बातों की जानकारी नहीं है, या है तो वे कुछ नहीं कर सकते! नियमित या कानूनी तरीके से कुछ भी करवाना हो तो आम कामकाजी इंसान को सौ-सौ चक्कर काटने पड़ते हैं, नौकरशाही की उदासीनता का मुकाबला करना पड़ता है, पैसा-टाइम बरबाद करना पड़ता है, पर फिर भी काम नहीं होता। मजबूर होकर इंसान इन आयोजित गुंडो और लूटेरों का शिकार बन जाता है। जब कानून बनाने और लागू करने वाले खुद ही इस गैर-कानूनी काम को चलाते हैं तो और कोई चारा भी नहीं है।

असलियत तो यह है कि आम मेहनतकशों की मुसीबतों से फायदा उठाकर अधिक से अधिक मुनाफा बनाना आज हमारी राजनीतिक – सामाजिक व्यवस्था का एक जाना-माना अभिन्न्ा हिस्सा बन गया है, एक ऐसा साधन जिससे शोषित जनता का शोषण और लूट कई गुना बढ़ जाता है।

 

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