रुपये की कीमत में गिरावट

रुपये की कीमत में गिरावट

रुपये का विनिमय दर (अंतर्राष्ट्रीय कीमत) पहले से ज्यादा तेजी से नीचे गिरने लगा है। साल की शुरूआत में यह 40 रु0 प्रति अमरीकी डालर था। अब यह 42.50 रु0 प्रति डालर है और अनुमान लगाया जा रहा है कि साल खत्म होने से पहले यह 50 रु0 प्रति डालर हो जायेगा।

रुपये के अवमूल्यन से किसको फायदा होता है?

हिन्दोस्तान के उन औद्योगिक घरानों को, जिन्होंने हिन्दोस्तानी बाजार के किसी हिस्से में इजारेदारी प्राप्त की है, फायदा है क्योंकि रुपये के अवमूल्यन से हिन्दोस्तानी उद्योग के उत्पादों की कीमत आयात की गई चीजों की कीमत से कम होती जाती है। जो पूंजीपति विदेशी बाजारों को माल निर्यात करके अपने मुनाफे बनाते हैं, उन्हें भी ज्यादा मुनाफे मिल सकते हैं या उनके बाजार में बढ़ोतरी हो सकती है क्योंकि हिन्दोस्तानी माल अब विदेशी बाजारों में ज्यादा सस्ते होंगे। हिन्दोस्तानी बाज़ार में घुसने वाले हर विदेशी उद्योगपति को भी फायदा होगा क्योंकि अब हर डालर के लिये ज्यादा हिन्दोस्तानी श्रम और संसाधन मिलेंगे।

किसे नुकसान होगा?

मजदूर, किसान और मध्यम वर्ग जो हिन्दोस्तानी समाज की बहुसंख्या है, रुपये का अवमूल्यन होने से उनका जीवन स्तर और घट जायेगा क्योंकि सभी सामग्रियां महंगी हो जायेंगी और विदेशी कर्जे का भार बढ़ जायेगा। सभी आयातित सामान महंगे हो जायेंगे, उत्पादन और वितरण की कीमत बढ़ जायेगी, हिन्दोस्तान के बाजार में मुद्रास्फीति बढ़ जायेगी। हिन्दोस्तानी कंपनियों और सरकार का विदेशी कर्जा रुपये में बढ़ जायेगा। मिसाल के तौर पर, अगर रुपये की कीमत 40 रु0 प्रति डालर से घटकर 50 रु0 प्रति डालर हो जाती हैं, तो 100 अरब डालर का कर्जा 400,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 500,000 करोड़ रुपये हो जायेगा।

रुपये की कीमत क्यों घट रही है?

रुपये का वर्तमान अवमूल्यन एशिया के बाजारों में बढ़ती उथल-पुथल की हालतों में हो रहा है।

जापानी येन का अवमूल्यन और चीनी मुद्रा का होने वाला अवमूल्यन भी इसके लिये जिम्मेदार है। यह दुनिया में पूंजीवाद के संकट और एशिया में विकास की गति के मंद हो जाने का नतीजा भी है। हिन्दोस्तान द्वारा परमाणु परीक्षण के बारे में पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हिन्दोस्तानी शेयर बाज़ार से पैसे निकाल लेने का विदेशी वित्त संस्थानों का फैसला भी इसका एक कारण है। रिजर्व बैंक पूरी कोशिश कर रहा है कि यह अवमूल्यन क्रमशः हो।

हिन्दोस्तान के कुछ सरमायदार और अंतर्राष्ट्रीय तौर पर सभी सरमायदार रुपये के अवमूल्यन से खुश हैं। उन्हें सिर्फ इस बात की चिंता है कि यह अवमूल्यन किस गति से तथा कितने आराम से होगा। सिर्फ पिछले हफ़्ते में ही भारतीय रिज़र्व बैंक ने रुपयों से डालर खरीदने में 3500 करोड़ रुपये खर्च किये ताकि अवमूल्यन क्रमशः हो।

सरकार क्या कर रही है?

वाजपयी सरकार अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपने आप को हिन्दोस्तानी गर्व का रक्षक दिखलाती है परन्तु आर्थिक हक़ीक़त, यानि रुपये का अवमूल्यन और रिज़र्व बैंक की हरकतें यह दिखाती हैं कि सरकार की नीति हर हिन्दोस्तानी वस्तु को सस्ता बनाने की नीति है, बेशक क्रमशः।

वाजपयी सरकार हिन्दोस्तान व विदेश में बड़े और मध्यम सरमायदारों के हितों की हिफ़ाज़त कर रही है, मजदूरों, किसानों और मध्यम वर्गों के जीवन स्तर को घटा कर।

भयानक कर्ज़ों का चक्र

पुराने कर्जे़ चुकाने के लिये नये उधार

हिन्दोस्तान द्वारा लिये जा रहे नये उधार मुख्यतः पुराने उधारों के मूलधन और ब्याज चुकाने में इस्तेमाल होते हैंे।

विश्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 1992 और 1997 के बीच, हिन्दोस्तान द्वारा कर्जा और ब्याज़ चुकाने में जितना खर्च किया गया था, वह विश्व बैंक से लिये गये नये उधारों से ज्यादा था।

हाल के परमाणु विस्फोटों के बाद अमरीका द्वारा लगाये गये प्रतिबंधों की हालत में, विश्व बैंक से नये उधार भी शायद नहीं मिलेंगे। अगर अमरीकी सरकार व विश्व बैंक की दूसरी सदस्य सरकारों को यह हक है कि वे हिन्दोस्तानी सरकार को नये उधार न दें, तो यह सवाल पैदा होता है।

क्या हिन्दोस्तान की सरकार को पुराने कर्जे न चुकाने का हक नहीं है? इस पर संसद में चर्चा क्यों नहीं हो रही है?

1992-97 के बीच विश्व बैंक से लिये गये उधार और कर्ज चुकाने का खर्चा (दस लाख डालर)
नये उधार 10,556
कर्ज चुकाया गया, ब्याज़ आदि सहित 10,805
कुल प्राप्ति -244

तामिलनाडु में राजकीय आतंक

हाल में तामिल नाडु एसेम्बली में एक दमनकारी बिल पास किया गया, जिसका नाम है तामिल नाडु आतंकवाद विरोधी अध्यादेश, 1998। राष्ट्रपति को यह बिल उनकी सहमति के लिये भेजा गया है।

पिछले मध्यावधि चुनावों के दौरान कोइमबातूर और तामिल नाडु के कुछ अन्य इलाकों में कई बम विस्फोट हुये थे, जिनमंे बहुत से बेकसूर लोग मारे गये थे। ये बम विस्फोट हिंसा और राजनीति के अपराधीकरण के वातावरण को दर्शाते हैं, जिसके जरिये शासक वर्ग तनाव और दहशत फैलाते हैं, लोगों को उकसाते हैं और उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया से अलग कर देते हैं। शासक वर्गों की पार्टियां इन अपराधों के लिये एक दूसरे पर कीचड़ उछालते है और “विदेशी हाथ” का भी ज़िक्र करते हैं। परन्तु वे सबसे पहले व सबसे भयानक हमला करते हैं लोगों और जन आन्दोलनों पर। इसमंे सभी शासक पार्टियां मिली जुली हैं। तामिल नाडु “आतंकवाद विरोधी” बिल को द्रमुक और अद्रमुक दोनों ने केन्द्र की भाजपा सरकार के साथ मिलकर पास किया।

यह बिल तामिल नाडु में पहला ऐसा कदम नहीं है। इससे पहले, तामिल नाडु सरकार ने जन संघर्षों पर एसमा और टाडा से हमला किया था। यह बिल टाडा का ही नया अवतार होगा। 1995 में देश भर में जन विरोध की वजह से टाडा को हटाना पड़ा था परन्तु इसके अन्तर्गत गिरफ़्तार हुए हजारों लोग अभी भी जेलों में बंद हैं। टाडा लागू करने वाले राज्यों में तामिल नाडु आगे था।

इस नये अध्यादेश की विशेषतायें टाडा जैसी ही हैं। इसके अन्तर्गत दोषी व्यक्ति को कम से कम तीन साल तक बंद कर दिया जायेगा। किसी व्यक्ति के पास “चोट पहंुचाने वाला हथियार”, यानि छुरी या उस्तरा होने पर भी उसे बंदकर दिया जा सकता है। डरा धमकाकर पुलिस को दी गई खुदगवाही सबूत के रूप में इस्तेमाल हो सकता है। बिना केस दर्ज किये व्यक्ति को तीन महीने तक बंद कर दिया जा सकता है।

1985 से 1995 के बीच, 65,000 लोगों को टाडा के अन्तर्गत बंद किया गया था परन्तु सिर्फ 450 लोगों के खिलाफ़ ही कोई इल्ज़ाम साबित हुये। यह है आतंकवाद-विरोधी कानूनों का असली रूप!

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