वर्ण-भेद

वर्ण-भेद

हर जाति या वर्ग के पशु-पक्षी प्रायः अलग अलग तरह के शब्द करते हैं । कुत्ते भों-भों करते हैं, बकरियाँ मैं-मैं करती हैं, चूहे चूँ-चूँ करते हैं, चिड़ियाँ ची-ची करती हैं, आदि । किसी एक वर्ग या जाति के पशु अथवा पक्षी अन्य वर्गों या जातियों के पशुओं अथवा पक्षियों के शब्द नहीं बोलते या नहीं बोल सकते। इसके विपरीत मनुष्य अनेक प्रकार के शब्दों अथवा ध्वनियों का उच्चारण करता या कर सकता है । इसका एक मुख्य कारण है।

पशु-पक्षियों आदि के मस्तिष्क अधिक पुष्ट तथा विकसित नहीं होते, इसलिए वे अपने मुख के विभिन्न अंगों पर ठीक और पूरा नियंत्रण नहीं रख सकते । अनेक प्रकार की ध्वनियों का उच्चारण करने और सीखने के लिए मनुष्यों को अभ्यास तथा प्रयास करना पड़ता है । प्रारम्भिक तथा शैशव अवस्था में बालक नाना प्रकार के शब्दों का उच्चारण नहीं कर पाता । वह पहले अपने माता पिता, बहन-भाइयों आदि से कोई शब्द बराबर सुनता रहता है। फिर उसे जैसे-तैसे बोलने का प्रयत्न करता है; और कुछ समय तक बराबर अभ्यास करते रहने पर वह उस शब्द-विशेष का उच्चारण करने में समर्थ होता है ।

जिस प्रकार तोते या मैना को बराबर कुछ समय तक प्रयत्नपूर्वक कुछ बोलना सिखाया जाता है; वह भी कुछ दिनों में ऐसे शब्दों या पदों का उच्चारण करना सीख लेता है। अतः यह निश्चित है कि अभ्यास और प्रयास से ही ध्वनियों का उच्चारण सीखा जाता है। जिन बच्चों को सबसे अलग रखकर पाला-पोसा जाता है, और बोलने का अभ्यास नहीं कराया जाता, वे शब्दों का उच्चारण न कर पाने के कारण गूंगे ही रह जाते हैं।

मनुष्य जब बोलता है तब उसे विभिन्न ध्वनियों का उच्चारण करने के लिए अपने मुख के कई अंगों (जैसे-कंठ, तालु, मूर्धा, दाँतों, होठों, नासिका, जिह्वा आदि) की सहायता लेनी पड़ती है। कुछ ध्वनियों का उच्चारण करने के लिए उक्त अंगों में से किसी एक अंग से ही काम लिया जाता है और कुछ ध्वनियों के उच्चारण के लिए दो या अधिक अंगों से भी काम लेना पड़ता है। नीचे के चित्र में मुँह के उक्त विभिन्न अंगों के स्थान बतलाये गये हैं।

  • क, ख, ग, घ, ङ, ह , अ, आ, और विसर्ग (:) की ध्वनियों का उच्चारण करते समय मुँह से निकलने वाली वायु को जिह्वा के पश्च भाग से कंठ में रोकते हैं । अर्थात् इन ध्वनियों के उच्चारण का मुख्य स्थान कंठ है, इसलिए इन्हें कंठ से निकलने वाली ध्वनियाँ अर्थात् कंठ्य-ध्वनियाँ कहते हैं।
  • च्, छ्, ज् , झ, ब् , य् , श् , इ और ई ध्वनियों का उच्चारण करते समय हम मुँह से निकलने वाली वायु को (कंठ में जीभ के पश्च भाग से न रोककर ) तालु में जीभ का- अग्र भाग लगाकर रोकते हैं। इसलिए उक्त ध्वनियाँ तालु से निकलने वाली अर्थात् तालव्य ध्वनियाँ कहलाती हैं।
  • ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष, और ऋ ध्वनियों का उच्चारण करते समय हम मुंह से निकलने वाली वायु को मूर्धा स्थान पर जीभ को कुछ घुमाकर उसकी नोक के निचले भाग या अधो भाग से रोकते हैं। इसलिए उक्त ध्वनियाँ मूर्धा से निकलने वाली अर्थात् मूर्धन्य ध्वनियाँ कहलाती हैं।
  • त्, थ् , द्, ध् , न , ल , और स् ध्वनियों का उच्चारण करते समय हम मुंह से निकलने वाली वायु को ऊपरी दाँतों पर जिह्वा लगाकर रोकते हैं । इसलिए ये ध्वनियाँ दाँतों से निकलने वाली अर्थात् दंत्य ध्वनियाँ कहलाती हैं।
  • प, फ, ब् , म , म् , व् , उ और ऊ ध्वनियों का उच्चारण करते समय हम मुँह से निकलने वाली वायु को होंठों से रोकते हैं। इसलिए इन ध्वनियो को होंठों से निकलने वाली अर्थात् ओष्ठ्य ध्वनियाँ कहते हैं ।
  • व ध्वनि को दन्त्योष्ठ्य कहना अधिक ठीक होगा क्योंकि इस ध्वनि का उच्चारण करते समय जिह्वा, दाँतों को भी स्पर्श करती है और होठों को भी।
  • ए तथा ऐ का उच्चारण कंठ और तालु के योग से होता है, इसलिए इन ध्वनियों को कंठ्य-तालव्य और ओ तथा औ का उच्चारण कंठ तथा ओष्ठ के योग से होने के कारण इन ध्वनियो को कंठ्य-ओष्ठय ध्वनियाँ कहते हैं।
  • पाँचों वर्गों की जो अंतिम या पंचम ध्वनियाँ (ङ्, ब् , ण, न , और म्) हैं उनका उच्चारण करते समय मुख-विवर के अतिरिक्त नासिका-द्वारों से भी वायु निकलती है। इसलिए इन ध्वनियों को अनुनासिक ध्वनियाँ भी कहते हैं।
  • इस प्रकार ङ् अनुनासिक कंठ्य, ब् अनुनासिक तालव्य, ण अनुनासिक मूर्धन्य, न अनुनासिक दंत्य और म् अनुनासिक ओष्ठ्य ध्वनि है ।

हमारी वर्ण-माला में ड, ढ, क्ष, त्र और ज्ञ वर्ण बढ़े हैं, जो वस्तुतः स्वतंत्र वर्ण नहीं हैं । ड़ और ढ वर्ण ड और ढ के ही कुछ बदले हुए रूप हैं। इनका उच्चारण करते समय जिह्वा के अग्र भाग को मूर्धा स्थान पर ले जाकर झटके से नीचे फेंकना पड़ता है। पर ड् और ढ का उच्चारण करते समय जिह्वा को झटका नहीं देना पड़ता ।

क्ष् , त्र और ज्ञ संयुक्त व्यंजन हैं। क्+ष से क्ष् , त्,+र से त्र तथा ज्+ञ से ज्ञ बनता है ।

इस प्रकार क्ष कंठ्य मूर्धन्य हुआ, और त्र दन्त्य मूर्धन्य हुआ और ज्ञ तालव्य अनुनासिक हुआ।

– ध्वनियो को व्याकरण में अक्षर या वर्ण कहते हैं।

– वर्ण या अक्षर से अभिप्राय सदा ध्वनि की लघुतम इकाई से होता है । ध्वनि की लघुतम इकाई वह कहलाती है जिसके खंड या टुकड़े न हो सकते हों।

जब हम ‘राम’ या ‘पुस्तक’ शब्द का उच्चारण करते हैं, तब हम कम से कम चार और सात लघुतम ध्वनियों का उच्चारण करते हैं। राम कहते समय हम र+आ+म् + अ ध्वनियों का उच्चारण करते हैं; और ‘पुस्तक’ शब्द कहते समय हमें पू+उ+स+त् +अ+क+ अ इन सात ध्वनियों का उच्चारण करना पड़ता है।

जिस प्रकार हम राम, पुस्तक, आदि शब्दों के छोटे छोटे खण्ड करते हैं, उस प्रकार र आ म् अ अथवा प्, उ, स् , त् , क आदि ध्वनियों के छोटे खंड नहीं कर सकते । इसी लिए इन्हें अक्षर (जिनका क्षरण न हो) या वर्ण कहते हैं।

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