व्याकरण का महत्व

प्राचीन तथा मध्य युगों में व्याकरण का क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत था। पर अब उसमें से भाषा विज्ञान, अर्थ विज्ञान और अलंकार शास्त्र ये तीन अंग अलग कर दिये गये हैं और ये स्वतंत्र-शास्त्रों के रूप में माने जाने लगे हैं। अब व्याकरण में बोल-चाल तथा साहित्य में प्रयुक्त होनेवाली भाषा के स्वरूप, उसके गठन, उसके अवयवों, उनके प्रकारों और पारस्परिक संबंधों तथा उनके रचना-विधान और रूप परिवर्तन का विचार होता है।

  • भाषा के मुख्य दो अवयव होते हैं-एक शब्द और दूसरे विराम चिह्न।
  • शब्द के अवयव बोल-चाल में ध्वनियाँ होती हैं और लेखन में अक्षर।
  • शब्दों के भेद विकारी तथा अविकारी होते हैं तथा उनके भी अनेक उपभेद होते है जैसे -संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, विभक्तियाँ, क्रियाएँ, क्रियाविशेषण, विस्मय-बोधक आदि होते हैं ।
  • शब्दों के यही भेद और उपभेद विशिष्ट क्रम से प्रस्तुत होकर एक वाक्य का निर्माण करते हैं ।
  • वाक्यों के भी कई अंग और प्रकार होते हैं।

इन्हीं सब बातों का विचार व्याकरण में होता है।

व्याकरण को वस्तुतः भाषा सम्बन्धी नियमों का संकलन कहना चाहिए। ये नियम वस्तु-स्थिति के आधार पर बनाये जाते हैं । भाषा में होने वाले विकास तथा परिवर्तन के फलस्वरूप नियमों में भी परिवर्तन की आवश्यकता होती है । साधारणतया साहित्यिक भाषा में बोल-चाल की अपेक्षा उक्त नियमों का पालन दीर्घकाल तक होता है और उनमें परिवर्तन करने का अवकाश भी कम होता है।

बोल-चाल की भाषा में प्रायः जल्दी-जल्दी परिवर्तन होता रहता है और इसी लिए उसके नियमों में भी प्रायः परिवर्तन होता चलता है।

व्याकरण का महत्त्व :

१. यही एक ऐसा श्रेष्ठ साधन है जिसके द्वारा हम जान सकते हैं कि वक्ता या लेखक का आशय क्या है। जिन लोगों को व्याकरणका ज्ञान नहीं होता वे भी अभ्यासवश वक्ता या लेखक का आशय तो जैसे-तैसे अवश्य समझ लेते हैं । परन्तु कुछ अवसर ऐसे भी होते हैं जिनमें व्याकरण का ज्ञाता ही लेखक या वक्ता का ठीक ठीक आशय समझ सकता है। व्याकरण से अनभिज्ञ कुछ का कुछ आशय भी समझ सकता है।

२. व्याकरण के ज्ञान से ही शुद्धतापूर्वक लिखा तथा बोला जा सकता है। जब हम लोग हर चीज शुद्ध चाहते हैं, तो क्यों न हम अपनी भाषा भी निर्दोष तथा शुद्ध रखें। भाषा की शुद्धता इसलिए भी आवश्यक है कि बिना इसके विचार विनिमय का साधन त्रुटि-पूर्ण रह. जाता है।

३. व्याकरण का सबसे बड़ा महत्त्व यह है कि यह भाषा का स्वरूप बिगड़ने नहीं देता | जिन भाषाओं के व्याकरण बन जाते हैं और उनका पठन-पाठन होने लगता है, वे भाषाएँ तथा उनके स्वरूप कम से कम साहित्यिक क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक स्थायी तथा स्थिर हो जाते हैं।

संस्कृत भाषा का इस समय तक जीवित रहना उसकी उच्चकोटि की व्याकरण पुस्तकों के कारण ही संभव हुआ है।

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