शान्ति बनाये रखने के बहाने हस्तक्षेप करने की अमरीकी नीति

शान्ति बनाये रखने के बहाने हस्तक्षेप करने की अमरीकी नीति

एक तरफ, दुनिया भर में निजीकरण और आर्थिक ढांचे में तब्दीली लाने के कार्यक्रम चल रहे हैं, लाखों-लाखों मजदूर, किसान, मध्यम वर्ग के लोग व आम जनता बेरोजगारी, सामाजिक खर्चे में कटौती, आदि की वजह से तबाह हो रहे हैं। दूसरी ओर, दुनिया के साम्राज्यवाद, अमरीकी साम्राज्यवाद की अगुवाई में, नई हालतों में विचारधारात्मक और राजनीतिक हमले और फौजी हमले को तेज़ कर रहा है। लोगों के जनतांत्रिक संघर्षों पर हमला करने के लिये एक हथियार जो तेज़ किया जा रहा है, वह है एक निरपेक्ष तीसरे दल के रूप में सीधा या गुप्त हस्तक्षेप। परन्तु एकमात्र मकसद है जन संघर्षों को बेरहमी से कुचलना या उन्हें गुमराह करके उन्हें जनता की लूट व दमन को मजबूत करने के साधन बना देना।

बालकन्स-कोसोवा और बोस्निया-में, नाइजेरिया तथा आयरलैंड में हाल के हादसे दिखाते हैं कि “लोकतंत्र” और “शान्ति” लाने के बहाने इन देशों में अमरीकी दखलंदाजी की वजह से लोगों का बंटवारा तथा हिंसा और बढ़ गई है, जिससे अमरीकी फ़ौजो को “शान्तिदूत” बनकर घुसने का ज्यादा मौका मिलता है। यही एक वजह है कि हिन्दोस्तान और दक्षिण-एशिया के किसी भी देश की लड़ाकू ताकतें, नागालैंड या कश्मीर में, नौजवानों या महिलाओं के बीच, सभी अपने मामलों में खुले या गुप्त रूप से अमरीकी
दखलंदाज़ी के खिलाफ़ चैकन्ना रहना चाहिये।

90 के दशक के आरम्भ में सोवियत संघ के पतन के साथ जो गैर संतुलन पैदा हुआ था, वह आज भी पूरा पूरा जारी है। दक्षिण एशिया में, शीतयुद्ध के बाद बाद की अवधि में भूतपूर्व सोवियत संघ के असर घट जाने के बाद, अमरीका ने इस इलाके को “सकारात्मक कार्यवाहियों में फंसाये रखने” के बहाने यहां के मामलों में दखल देने की अपनी कोशिशों को बढ़ा दिया है। दिल्ली के नेताओं के साथ अपने खुलेआम समझौते में अमरीका के नेताओं के साथ अपने खुलेआम समझौते में अमरीकी अफ़सर जो “सकारात्मक कार्यवाहियां” करते हैं, उनके पीछे छिपी हैं वे सारी गुप्त हरकतें जो वे सरकारी दलों, विपक्ष दलों, जन आन्दोलनों व जनता के दुश्मनों के साथ करते हैं। पिछले दशक के दौरान, हिन्दोस्तान के उत्तर पश्चिम व उत्तर पूर्व के संघर्षों में अमरीका का हाथ प्रतिदिन साफ नज़र आता है, चाहे यह खुलेआम हो या अपने गुप्त प्रतिनिधियों के जरिये हो। हिन्दोस्तान- पाकिस्तान के झगड़े में टांग अड़ाने और उस झगड़े को हल करने में “मदद” करने में अमरीका बहुत इच्छुकता और उत्सुकता दिखा रहा है और अब उत्तर पश्चिम व हिन्दोस्तान दूसरे हिस्सों में विभिन्न बाग़ी व गैर-बाग़ी दलों के साथ ज्यादा से ज्यादा सम्पर्क बनाने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा हिन्दोस्तान के विभिन्न स्थानीय पूंजीपति दलों को दिया गया धन भी एक और रास्ता है जिससे अमरीका अपने इरादों को पूरा करता है। हाल में आंध्र प्रदेश के लिये दिया गया विश्व बैंक का बड़ा उधार इसका सबूत है।

बाहर के असंतुलन के साथ साथ हिन्दोस्तान के अन्दर भी असंतुलन रहा है। मई में हिन्दोस्तान और पाकिस्तान द्वारा परमाणु विस्फोट के पीछे मुख्य वजह थी शीत युद्ध के बाद द्विध्रुवीय दुनिया का संतुलन बिगड़ना और हिन्दोस्तान व पाकिस्तान मंे अंदरूनी राजनीतिक संकट। हिन्दोस्तानी और पाकिस्तानी सरकारों का रवैया बहुत बेतुका है। एक तरफ वे अमरीका की अगुवाई मंे बड़ी ताकतों का विरोध करते हुये परमाणुकरण के जरिये दुनिया में अपने हितों के लिये लड़ रहे हैं। दूसरी ओर, वे यह गलतफहमी फैला रहे हैं कि अमरीका के साथ मिलजुलकर काम करने से उन पर अमरीकी आर्थिक प्रतिबंध कम हो जायेगा।

इन हालातों में लोगों का एकमात्र उचित और सचेत रवैया यही होगा कि वे सरकार विश्वसनीयता के संकट का फायदा उठाकर हिन्दोस्तान के आर्थिक-राजनीतिक नवीकरण के लिये संघर्ष को तेज़ कर दें और विदेशी पूंजीं को जनता की खुशहाली का आधार
या परमाणुकरण को सुरक्षा का आधार बनाना छोड़ दें। इसी प्रकार अमरीका की नीति को हराया जा सकता है, चाहे यह “शान्ति दूत” की नीति हो, या प्रतिबंध हटाने की या कश्मीर-नागालैंड में समझौता करवाने की। अब यह स्पष्ट है कि अमरीका, चीन और संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्य “शान्ति लाने” के बहाने हिन्दोस्तान और दक्षिण एशिया के मामलों में दखलंदाज़ी कर रहे है। शान्ति लाने और परमाणु हत्याकांड के खतरे को टालने के बहाने फौजी हस्तक्षेप भी किया जा सकता है। जो भी शान्ति समझौता अमरीका करवाना चाहता है, चाहे कश्मीर में हो या नागालैंड में, तमिलों के साथ या चकमा लोगों के साथ, वह लोगों को बाहर रखने और लोगों को फिर से बांटने के मकसद से किया जायेगा। ऐसा ही आयरलैंड के शान्ति समझौते में हुुआ है। हिन्दोस्तान के नवीकरण के लिये लड़ने वालों को गुमराह करने के लिये अमरीका यह झूठा प्रचार फैलाता है कि वह लोगों के हितों में काम कर रहा है और इस प्रकार तीसरे मध्यस्थ दल के रूप में अपने आप को उचित ठहराता है।

रंग बदल रहा है आसमान का

देखो, रंग बदल रहा है आसमान का
साथी रे, भाई रे, Û Û Û Û Û
रंग दे रही तुम्हें हवा विहान का
साथी रे, भाई रे, Û Û Û Û Û

खेत जग गये, कि गांव जग गया
नगर नगर जगे, कि देश जग गया
चलो उठो मिलाके हो कदम
मुश्किलें उठीं तो ए-सहन
दम लगा दें अपनी जान का
साथी रे, भाई रे, Û Û Û Û Û

रुके न राह में कदम न भूल से
फूल लक्ष्य तो डरो न शूल से
शोषितों की बेड़ियों को तोड़ दो
हर तले से रुख हवा का मोड़ दो
वक्त आ गया है इम्तहान का
साथी रे, भाई रे, Û Û Û Û Û

चलो जहां न शोषितों की बस्तियां
बिके नहीं जहां जवान मस्तियां
जहां न जंग और जुल्म हो सके
जहां न चोर देशवक्त हो सके
राज हो जहां मजदूर-किसान का
साथी रे, भाई रे, Û Û Û Û Û

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