शोषण और दमन की व्यवस्था महिलाआंे को अपना हक नहीं दिला सकती

शोषण और दमन की व्यवस्था महिलाआंे को अपना हक नहीं दिला सकती

हिन्दोस्तान की महिलाआंे की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। मेहनतकष जनता के हिस्सा बतौर वे गरीबी, भुखमरी, निरक्षरता, बीमारी आदि के षिकार तो है ही, इसके अलावा महिला होने के नाते उन्हें आर्थिक सामाजिक, लिंग सम्बंधी अत्याचार का भी सामना करना पड़ता है। जातिवाद, धार्मिक कट्टरपन और पिछडे़ रीतिरिवाज़ खास रूप से महिलाओं पर अत्याचार करते हैं। शोषण और दमन की इस व्यवस्था को खत्म करने तथा उसे तब्दील करके एक उज्जवल भविष्य का निर्माण करने के जन आन्दोलन में महिलायें हमेषा आगे रही हैं। महिलायें अपने लिये तथा समाज के सभी दबे कुचले तबकों के लिये बराबर के हकों की मांग कर रही हैं, अपने भविष्य को खुद निर्धारित करने के लिये अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता की मांग कर रही हैं।

संसदीय हरकतें

परन्तु संसद के इस सत्र में जब महिला आरक्षण बिल पर वाद-विवाद शुरु हुआ, तो हिन्दोस्तान की महिलाओं की इन हालतों पर कोई चर्चा नहीं हुई। महिलाओं की समस्याओं व मांगों का कोई ज़िक्र न हुआ। महिला आरक्षण बिल के जरिये महिलाओं की समस्यायें हल होंगी या नहीं या किस हद तक, इन बातों पर भी कोई वाद-विवाद न हुआ। बल्कि बेहद
घिनौने व नीच तरीके से शासक पार्टी व विपक्ष पार्टियों के संासदों ने आपस में छीना-झपटी, मार-पीट, गाली-गलोच आदि करके बिल को स्थगित कर दिया। अपनी नीच हरकतों को उचित ठहराने के लिये दूसरे दबे कुचले तबकों का बहाना बनाया और शोषित महिलाओं को समाज के अन्य शोषित तबकों के खिलाफ़ दिखाने का प्रयास किया। तीन दिन तक संसद की सारी कार्यवाहियों को स्थगित करके महंगाई या दूसरे किसी जरूरी मसले पर चर्चा करना नामुमकिन कर दिया। इन हरकतों से यह सच्चाई फिर एक बार साबित हो गई कि संसद में बैठी सभी राजनीतिक पार्टियां सिर्फ अपनी गद्दियां बचाने में व्यस्त है, कि असलियत में उन्हें देष की या देष की जनता की किसी भी समस्या को हल करने की चिंता नहंी है।

महिलाओं के बढ़ते संघर्ष व आरक्षण बिल

हिन्दोस्तान की महिलायें लगतार अपने ऊपर हो रहे राजकीय व सामाजिक अत्याचार, भेदभाव व असमानता के खिलाफ, गरीबी, बेरोजगारी, आदि के खिलाफ डट कर संघर्ष करती रही है। समाज के हर पीड़ित तबके के संघर्ष में महिलायें आगे आ रही हैं। इस प्रकार, महिलाओं के उद्धार का संघर्ष मजदूर वर्ग और सभी दबे-कुचले लोगों के उद्धार के संघर्ष का एक महत्चपूर्ण हिस्सा है। हाल के सालों में महिला आन्दोलन नई आर्थिक नीतियों, उदारीकरण व निजीकरण के खिलाफ़, राजकीय आतंकवाद और घटते जीवन स्तर के खिलाफ़ एक प्रबल ताकत बन कर आगे आने लगा है।

महिलाओं के इन बढ़ते संघर्षों और समाज को अपने व सभी दबे-कुचले लोगों के हित में तब्दील करने के लिये राजनीतिक सत्ता की मांग के जवाब में हुक्मरानों ने यह महिला आरक्षण बिल प्रस्तावित किया है। पिछले 5 सालों में जो भी पार्टी या पार्टियां केन्द्रीय सरकार की बागडोर संभालने आयी, पहले कांग्रेस, फिर संयुक्त मोर्चा और अब भाÛजÛपाÛ, सभी ने सत्ता में आते ही बड़ी धूमधाम से ऐलान किया कि वे महिला आरक्षण बिल को पास करवायेंगे। इस बिल के अनुसार, संसद और राज्य तंत्र में सभी स्तरों में महिलाओं के लिये 33 प्रतिषत सीटें आरक्षित की जायेंगी। इस बिल का पास होना हिन्दोस्तान की महिलाओं के लिये बहुत बड़ी विजय बताया गया, महिलाओं के उद्धार के लिये इसे एक बहुत महत्वपूर्ण कदम बताया गया।

परन्तु पिछले दिनों में संसद में जो बेषर्म हरकतें देखने में आई, क्या वे महिलाओं को उस संसद में हिस्सा लेने को प्रोत्साहित कर सकती हैं? क्या संसद में एक तिहाई सीटों को लेकर छीना झपटी और कुत्ते-बिल्ली जैसी लड़ाई करने का हक ही वह हक है जिसके लिये तमाम दबी कुचली महिलायें तरस रही हैं? संसद, जिसका आम मेहनतकष स्त्री-पुरुष की समस्याओं से कोई मतलब नहीं है, जिसमें तरह-तरह की राजनीतिक पार्टियां अलग-अलग बड़े सरमायदार दलों के इशारे पर नाचती हैं और अपनी कुर्सी के शतरंज में दबे-कुचले तबकों के दुख-दर्द को प्यादा बनाकर उनसे खिलवाड़ करती हैं, क्या इस संसद में अपने नुमायंदों को बिठाकर आम मेहनतकष महिलाओं या किसी खास दबे-कुचले तबके की महिलाओं को अपने हक मिल सकते हैं?

आरक्षण की राजनीति

हमारे देष में आरक्षण की राजनीति का लम्बा इतिहास है। बर्तानवी बस्तीवादियों ने सबसे पहले यह नीति शुरु की थी, लोगों के बीच धर्म व जात के दीवारों को बरकरार रखने और मजबूत करने, समाज के अलग-अलग तबकों के कुछ गिने चुने लोगों को विषेष अधिकार देकर उनकी वफादारी खरीदने के लिये। हिन्दोस्तानी गणराज्य ने इस आरक्षण नीति को अपनाया तथा और विस्तृत किया, ठीक उन्हीं इरादों से, जो कि बर्तानवी बस्तीवादियों के इरादे थे। यह दबे कुचले तबकों को बराबरी देने के नाम पर किया गया, पर इसका मकसद था गिने-चुने लोगों को विषेष अधिकार देना, न कि सबको बराबर का हक देना। पिछले 50 सालों से चल रही इस नीति के अंजाम हमारे सामने हैं। सामाजिक असमानता कई गुना बढ़ गई है। खास तबकों के गिने चुने नुमायंदो को सत्ता मंे बिठाकर यह कहा जाता है कि इन तबकों को राजनीतिक सत्ता मिल गई है जब कि असलियत में गरीबों, दलित वर्गों व जातियों पर बहषियाना हमले पूरे राज्यतंत्र की मदद से लगातार चलते रहे हैं। क्या हिन्दोस्तान की तमाम दबी-कुचली महिलायें इसी प्रकार की राज्य सत्ता चाहती हैं? क्या इससे उनके सारे अरमान पूरे हो जायेंगे, जिनके लिये वे लड़ती आ रही हैं?

हिन्दोस्तान की तमाम संघर्षरत महिलाओं को इस सच्चाई से गुमराह नहीं होना चाहिये कि जब तक राज्य सत्ता बड़े पूंजीपतियों और उनके विदेषी सहायकों के हाथों में होगी और संसद व राज्य तंत्र उन्हीं की सेवा में लगी रहेगी, तब तक मजदूर, मेहनतकष, महिलायें, नौजवान, दबी-कुचली जातियों व जनजातियों के लोग, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के लोग, सभी गरीबी, बेरोज़गारी, राजकीय आतंकवाद व अत्याचार के षिकार बनते रहेंगे, राज्य सत्ता से वंचित रहेंगे। विषेष अधिकारों पर चलाई जाने वाली राजनीति दबे कुचले लोगों को बराबर के हक नहीं दिला सकती। अपने हकों के लिये, अपने हाथों में सत्ता लेने के लिये, महिलाओं को सभी मेहनतकषांे व समाज में तब्दीली चाहने वाले सभी तबकों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाकर, शोषण और दमन की इस राजनीतिक व्यवस्था को तब्दील करने के लिये लड़ना होगा।

 

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