सरकार बदलने से नहीं चलेगा यह राज्य बदलना पड़ेगा!

सरकार बदलने से नहीं चलेगा यह राज्य बदलना पड़ेगा!

मजदूर, किसान, महिलायें, नौजवान, सभी दबे कुचले लोग हज़ारों बार नारा लगा चुके होंगे कि

“रोजी रोटी दे न सकी जो
वह सरकार निकम्मी है,
जो सरकार निकम्मी है
वह सरकार बदलनी है।“

सरकारें तो हम बहुत बदल चुके। आजादी के बाद के पचास सालों में केन्द्रीय व राज्य सरकारें अनेकों बार बदल चुकी हैं, चाहे वे चुनावों के जरिये हो या फिर सरकारों को गिराकर। यहां तक कि सिर्फ पिछले नौ साल में केन्द्रीय सरकार आठ बार बदल चुकी है। और अगर आप उत्तर प्रदेश जैसे राज्य पर नजर डाले तो वह केन्द्रीय सरकार का भी रिकार्ड तोड़ चुका है।

परन्तु देखा जाये तो आज तक हम में से बहुतों के लिये रोजी रोटी एक ख्व़ाब ही रहा है। जिंदगी की खुशहाली तथा सुखचैन भी इसी तरह एक ख़्वाब ही रहा है। यानि यह सोच तथा उपदेश, कि सरकार बदलने से रोजी रोटी मिलेगी, सुखचैन मिलेगा -यह सोच व उपदेश सरासर गलत है।

100 दिन ही भाÛजÛपाÛ सरकार ने मुश्किल से पूरे किये जबकि सरकार बदलने की बातें हो रही हैं। विपक्ष के हीरो – लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, सोनिया गांधी, चंद्रशेखर, इत्यादि केन्द्र में भाÛजÛपाÛ सरकार को गिराने की साजिश़ रच रहे हैं। वरिष्ठ माÛकÛपाÛ नेता ज्योति बसु ने इस “महान” काम के लिये कांग्रेस (इ) को खुलेआम संसदीय कम्युनिस्टों का समर्थन दिया है। दूसरी ओर, भाÛजÛपाÛ और उनके सहयोगी दल बिहार, तामिल नाडू, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल व अन्य प्रदेशों की राज्य सरकारों को गिराने की साज़िश रच रहे हैं। सरकारें बदलने के इस नाटक में हरेक अभिनेता अपनी हरकतों को “देश के उच्चतम हितों के लिये” बताता है।

पर हक़ीकत कुछ और ही है। इनकी हरकतों के पीछे इनके निजी स्वार्थ छिपे हुये हैं। और हिन्दोस्तानी व विदेशी पूंजीपतियों के अलग अलग परस्पर विरोधी गुटो के स्वार्थ भी छिपे हैं। इन सरकारों के बदलने से न तो मजदूरों, किसानों या मध्यम वर्गोे को रोजी रोटी मिलेगी, और न ही जनता को खुशहाली या सुरक्षा मिलेगी।

ऐसा क्यों है कि सरकारें बदलने से भी मेहनतकशों को रोजी-रोटी सुरक्षा या खुशहाली नहीं मिलती? इसकी वजह साफ़ है। हमारी अर्थव्यवस्था एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जहां मेहनतकशों का खून पसीना पूरा निचोड़ा जाता है, जहां देश के श्रम व कुदरती संसाधनों की सरासर लूट होती है। इस अर्थव्यवस्था को कायम रखने वाला राज्य फौजी ताकतों, पुलिस, जेल, नौकरशाही, न्यायतंत्र आदि से बना हुआ है। यह राज्य इस लूट खसौट को करवाता है, लूटे गये धन को हिन्दोस्तानी और विदेशी सरमायदारों के बीच बांटता है और मेहनतकशों के हर प्रतिवाद को बेरहमी से कुचलता है। यह राज्य साम्प्रदायिक झगड़े भड़काता है, समय समय पर लोगों का कत्लेआम करवाता है और आतंकवाद को बढ़ावा देता है, ताकि लोग लगातार तनाव और आतंक के माहौल में रहें, बंटे और भटके हुये रहें, ताकि एकजुट होकर ठंडे दिमाग से समाज की समस्याओं को न सुलझा सकें। यह राज्य और यह अर्थव्यवस्था जिसकी यह राज्य हिफ़ाज़त करता है, यही हमारे मेहनतकशों के दुख दर्द की वजह है। इसी की वजह से आज भी, रोटी, कपड़ा, मकान जैसी बुनियादी चीजें भी अधिकतम लोगों को नहीं मिलती हैं, बाकी शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जो हर सभ्य समाज की निशानी हैं, वे तो अपने यहां दूर की बातें रही हैं। संसदीय लोकतंत्र के इन पचास सालों में सरकारें चाहे कितनी बार बदली हों परन्तु यह राज्य नहीं बदला हैै। पचास साल पहले देश का राज्य हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों के हाथों में आया और अभी भी देश के असली राजा बड़े सरमायदार हैं। और जब तक यह राज्य नहीं बदलेगा, तब तक असली राजा बड़े सरमायदार ही रहेंगे और बेशक कितनी भी बार सरकारें बदले, रोजी रोटी, खुशहाली और सुरक्षा हमारी जनता के लिये एक ख़्वाब ही रहेंगी।

इस राज्य के अन्दर सरकार की क्या भूमिका होती है? पूरी सरकार, प्रधान मंत्री से लेकर सभी मंत्रियों तक, हमारे असली हुक्मरान के राजनीतिक नुमायंदे हैं। सरकार के सभी मंत्री कठपुतले हैं जब कि असली हुकमरान वह मदारी है जो पीछे से उन्हें नचा रहा है। और वह मदारी, वह असली हुक्मरान कौन है, जिनके इशारे पर यह सरकार चलती है और जिनकी सेवा यह राज्य करता है? असली हुक्मरान है हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार। चुनाव करवाना, सरकार बनाना या बदलना, यह सब तो बस इन मदारियों का खेल है, उन पुतलों को चुनने के लिये जो इनके इशारों पर नाचेंगंे। सरकार या प्रधान मंत्री या मुख्य मंत्री बदलने से राज्य नहीं बदल जाता। असली हुक्मरान नहीं बदल जाते।

जो भी कोई सरकार बदलने के लिये आज अभिायान चला रहें है, वे दबे कुचले लोेगों को बेवकूफ बना रहें है। लोगों का ध्यान भटका रहें हैं। लोगो को अपने दयनीय हालातों को लेकर अत्यंत आक्रोश है और वे इन हालातों को बदल कर एक खुशहाल जीवन के लिये लालायित है। इसके लिये उन्हें सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक प्रणाली को बदल कर उसके स्थान पर अपने हित की एक नयी सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक प्रणाली बसाने के फौरी कार्यक्रम के लिये एकजुट होना पड़ेगा। दूसरे शब्दो में लोगों को राज्य बदलने का प्रोग्राम उठाना पड़ेगा। इस नेक काम से सरमायदारी पार्टियां मेहनतकशों का ध्यान हटा रही है, सरकार बदलने का नारा देकर, और इस तरह वे बड़े सरमायदारों व इस शोषण की व्यवस्था व इस राज्य की सेवा कर रहे हैं। वे इस बात को साफ-साफ दिखा रही हैं कि उन्हें जनसमुदाय के बारे में कोई चिंता नहीं है। उनकी लड़ाई हुकमरानों की आपसी लड़ाई है कि हिन्दोस्तान के शोषण और लूट से किसको सबसे ज्यादा फायदा होगा, न कि इस शोषण और लूट को कैसे खत्म किया जाये। उनकी करतूतें पुराने ज़माने के राजा-महाराजाओं की तरह हैं, जब राजमहलों के अन्दर एक राजा को गिराकर दूसरे राजा को सिंहासन पर बिठाने के लिये षड्यन्त्र रचे जाते थे, चाहे प्रजा भाड़ में जाये। सबसे दुख की बात तो यह है कि माÛकÛपाÛ के नेता, जो अपने आप को मेहनतकशों के नेता बतलाते हैं, खुद ही इन षड्यंत्रों में बड़े उत्साह के साथ हिस्सा ले रहे हैं।

जहां तक जनसमुदाय का सवाल है, चाहे सरकार हज़ार बार भी बदल जाये, हमें रोजी रोटी, खुशहाली या सुरक्षा नहीं मिलने वाली है। अगर यह सब मिलना है तो राज्य को बदलना पड़ेगा। वर्तमान राज्य-फौज़, पुलिस, नौकरशाही, न्यायतंत्र और राजनीतिक व्यवस्था-बड़े सरमायदारों के लिये देश व जनता की लूट-खसौट करने का साधन है। इसे बदलकर, हमें एक ऐसा राज्य बनाना होगा जिसमें देश के इतिहास में पहली बार, देश की दौलत को पैदा करने वाले मजदूर और किसान असली हुक्मरान होंगें। वर्तमान राज्य शोषकों को खुशहाली और सुरक्षा दिलाता है। पर मजदूर और किसान जिस राज्य को बनायेंगें, उसमें सभी मेहनतकशों को खुशहाली और सुरक्षा मिलेगी। सभी मजदूरों, किसानों औेर मध्यम श्रेणी के लोगों को गतिमान करके इस प्रकार के राज्य को बनाने के लिये कम्युनिस्टों को एकाग्रता से काम करना चाहिये।

सरकार बदलने सें काम नहीं चलेेगा।
यह राज्य बदलना पड़ेगा!

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