हरियाणा के वन मज़दूरों नेे चंडीगढ़ में प्रदर्शन किया

हरियाणा के वन मज़दूरों नेे चंडीगढ़ में प्रदर्शन किया

वन विभाग मजदूर यूनियन, ने अपनी मांगे स्वीकार न किये जाने के कारण 27 जुलाई को चंडीगढ़ में हरियाणा विधान सभा के सामने प्रदर्शन किया गया। वन विभाग मजदूर
यूनियन की एक महत्वपूर्ण बैठक में उक्त आशय का निर्णय किया गया था। इसमें वन विभाग के अधिकारियों के प्रति भारी रोष व्यक्त किया। यूनियन की मुख्य मांग है कि अक्टूबर 1997 को मुख्य वन पाल व वन आयुक्त के साथ हुए समझौते को लागू किया जाए। मुख्य वनपाल ने यूनियन को बातचीत के लिए भी आंमत्रित नहीं किया, जिसके कारण रोष व्याप्त है।

श्रम विभाग भी प्रबंधकों का दावेदार

आदरणीय संपादक महोदय, पिछले चार वर्षाे से मूलचंद खैराती राम अस्पताल के लगभग 1000 श्रमिक प्रबंधको की क्रूरता का शिकार है और अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है। प्रबंधकांे की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी क्योंकि वह भारत सरकार द्वारा व्यवस्थित किसी भी कानून अथवा न्याय को नहीं मानते हैं। कर्मचारी लगातार केन्द्रीय सरकार, स्थानीय सरकारों एवं श्रमिकों के हमदर्द श्रम विभाग के सम्मुख अपना दुखड़ा रोते आये हैं मगर सभी की ओर से आश्वासन तो मिला मगर मूलचंद खैरातीराम अस्पताल के प्रबंधक सभी को विटामिन की ऐसी गोली खिलाने में विशेषज्ञ हैं कि सभी उन्हीं के गुण गाने लगते हैं यही कारण है यहां के प्रबंधकों को किसी की परवाह नहीं हैं।

श्रमिकों का मनमाना शोषण करने में प्रबन्धकों ने दिल्ली पुलिस का बी.पी. कन्ट्रोल अपने हाथ में पकड़ा ही हुआ है साथ ही स्थानीय सरकार एवं श्रम विभाग की निःशुल्क विटामिन थरैपी के अधीन रखा हुआ है। श्रमिकों के अनेकों केस सालों से श्रम विभाग में लम्बित है और कोई सुनने वाला नहीं दूसरी और यदि प्रबन्धक श्रमिकों पर झूठा केस बना कर उन्हें फंसाने की रणनीति बनाता है तो कालका जी का श्रम विभाग तत्काल संस्था में पहुंच जाता है और श्रमिकों के खिलाफ झूठे केस बनाने में प्रबन्धकों की पूर्ण सहायता करता है। हाल ही में दो श्रम अधिकारी मूलचन्द अस्पताल में प्रबन्धकों द्वारा बुलाये गये और उन की झूठी गवाहियां बुलवा कर प्रबन्धकों श्रमिकों के खिलाफ 300 मीटर का इन्जक्शन आॅर्डर लेने में कामयाब हो गये जब की सिविल कोर्ट द्वारा पहले से ही 25 फुट का स्टे ओर्डर (स्थाई) लागू था।

प्रबन्धकों के श्रमिक विरोधी रवैये को देखते हुए यहां के जुझारू श्रमिकों ने कमर कस ली है और न्याय प्राप्ति के लिए एकजुट हो कर हर चुनौती का सामना करने की कसम खाई है। यूनियन अध्यक्ष श्री जगतराम ने बताया कि धर्मार्थ की आड़ में चलाये जा रहे इस अस्पताल में बीमार रोगियों को मनमाने ढंग से लूटा जाता है और लूट का पैसा श्रमिकों के शोषण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। महासचिव श्री विजेन्द्रर सिंह के अनुसार प्रबन्धक न तो ट्रस्ट के नियमों की ही परवाह करते है और न ही किसी श्रम कानून अथवा नियम को ही मान रहे हैं। प्रवन्धकों ने पिछले हुए समझौतो के तहत मिल रही सभी सुविधायें समाप्त कर दी हैं और समझौते की शर्तों के अनुसार पांचवां वेतन अयोग भी लागू नहीं किया जिसके लिए श्रमिक एकजुट हो कर संघर्ष छेड़े हुए हैं। पिछले लगभग साढे़ तीन वर्षों से लगभग 125 श्रमिकों को नौकरी से निकाले हुए हैं और
धीरे-धीरे इन स्थाई श्रमिकों की संख्या बढ़ती चली जा रही है। जानकार सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस अस्पताल की प्रमुख ट्रस्ट जो चेयरमैन भी है शराब के नशे में हमेशा चूर रहता है और जब से उस ने संस्था की बागड़ोर अपने हाथ में ली है इस विश्व प्रसिद्ध अस्पताल की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिला दी है।

जनता के पैसे लूटकर पूंजीपतियों को मुनाफ़ा दिलाना

चार मुख्य विकास बैंक, इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इनवेस्टमेंट कारपोरेशन आफ इंडिया (आईÛसीÛआईÛसीÛआईÛ), इंडस्ट्रियल डेवेलपमेंट बैंक आफ इंडिया (आईÛडीÛबीÛआईÛ), इंडस्ट्रियल फायनैंस कारपोरेशन आफ इंडिया (आईÛएफÛसीÛआईÛ) और सÛसीÛआईÛसीÛआईÛ (जो 1997 में आईÛसीÛआईÛसीÛआईÛ के साथ जुड़ गया था) – ये बैंके हिन्दोस्तानी सरमायदारों को सस्ते दर पर लम्बे अरसे के लिये पूंजी दिलाने के मकसद से स्थापित की गई थी। 1994-95 में इन संस्थानों ने हिन्दोस्तानी सरमायदारों को 2,57,000 करोड़ रुपये की पंूजी दिलायें। यह पैसा सरकार ने सस्ते ब्याज दर पर विदेश से उधार में लिया था।

राष्ट्रीयकृत बैंकों ने सरमायदारों को पूंजी के रूप में लगभग 400,000 करोड़ रुपये उधार दिये हैं। इन उधारों में से हजारों करोड़ों रुपये कुछ समय बाद “बुरे उधार” करार कर दिये जाते हैं और सरमायदारों को उन्हें चुकाना नहीं पड़ता। 1994 में रिज़र्व बैंक ने 37,000 करोड़ रुपये “बुरे उधार” करार कर दिया। जब भी उधार लेने वाला पूंजीपति कर्जा नहीं चुका सकता है तो बैंके अक्सर इन कर्जों को चुकाने का समय बढ़ा देते हैं। इसलिये यह मांग, कि जनता के हित के लिये हिन्दोस्तान के विदेशी कर्जे का चुकाना कुछ समय के लिये स्थगित किया जाये एक अत्यन्त जायज़ और मुमकिन मांग है।

सरकारी विकास बैंक किस प्रकार जनता के पैसे से पूंजीपतियों को दिवालियापन से बचाते हैं, इसकी एक मिसाल जहाज़ उद्योग में देखी जा सकती है। एसÛसीÛआईÛसीÛआईÛ को ऐसे समय पर शुरू किया गया था जब सरकार द्वारा जहाज़ उद्योग को उधार दिये गये सैंकड़ों करोड़ों रुपये का पूरा पूरा नुकसान हो गया था। इस नुकसान की वजह थी बजट में समर्थन, 3.5 प्रतिशत का कम ब्याज दर और कर्जा चुकाने की ओर लापरवाही। तब सरकार ने इस नुकसान को सुधारने का काम इन संस्थानों को सौंपा।

जहाज़ उद्योग के उन मुश्किल व संकटग्रस्त दिनों में इस वित्त संस्थान ने उद्योग को ऐसे उधार दिये, जिससे उधार के पैसे का एक हिस्सा जहाज़ उत्पादन के काम में इस्तेमाल हुआ और बाकी हिस्से को उद्योगपति पूंजी के रूप में इस्तेमाल करके अपने धन बढ़ाये। इस प्रकार से उद्योग संकट से बच निकला और कर्जे भी चुका सका। इस प्रकार, सरकार ने अपने पैसे से (यानि मेहनतकश जनता से लूटे गये पैसे से) उद्योगपतियों को संकट से बचने में मदद की। इसकी एक मिसाल टोलानी शिपिंग है, जिसका लगभग 30 करोड़ रुपये का कर्जा पूरी तरह चुकाया गया। इसी प्रकार, अन्य उद्योगों में भी सरकार मेहनतकशों से लूटे गये पैसे से उद्योगपतियों की मदद करती है।

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