हिन्दोस्तान साहूकारों के चंगुल मंे

हिन्दोस्तान साहूकारों के चंगुल मंे

इस साल के बजट में पहले लिये गये उधारों पर ब्याज़ चुकाने के लिये 75,000 करोड़ रुपये रखे गये हैं। यह ब्याज उन उधारों पर है जो हिन्दोस्तान की सरकार ने हिन्दोस्तान के अंदर और बाहर से लिये हैं। यह साल भर के पूरे खर्चे का लगभग 28 प्रतिशत है और पूरे प्राप्त राजस्व का 40 प्रतिशत है। इससे यह जाना जाता है कि हिन्दोस्तानी सरकार घरेलू और विदेशी साहूकारों को ब्याज देने के लिये अपनी आमदनी का काफी बड़ा हिस्सा खर्च करती है। यह देश के संसाधनों पर बहुत बड़ा बोझ है। यही वजह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसी लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं किया जाता है।

उधार लेने और फिर दम तोड़ने वाले ब्याज भुगतने का खतरा हिन्दोस्तानी लोगों के लिये कोई नई बात नहीं है। हिन्दोस्तान में लगभग सभी मेहनतकशों के परिवारों को उधार लेने पड़ते हैं। पहले से ही न्यूनतम जरूरतों को पूरा करना मुश्किल था, फिर परिवार ने बहुत बड़ा उधार ले लिया, तो बस कुछ ही देर में साहूकार आ जायेगा और
घर की सारी जायदाद हड़प लेगा। सिर्फ इतना ही नहीं। हिन्दोस्तान में पुरूष, स्त्री और बच्चे तक भी जिंदगी भर के लिये बंधुआ मजदूर बन जाते हैं अगर उधार को समय पर ब्याज सहित वापस न किया जाए।

जब कोई सरकार उधार लेती है तो ऐसा ही होता है। जब देश की अर्थव्यवस्था का पहले से ही बुरा हाल है, जब अधिकतम लोग अनपढ़, भूखे, नंगे हैं, तब उधार लेना और उस पर ब्याज़ चुकाना लोगों को और गरीबी में डाल देता है। जब पुराने उधारों और ब्याज को चुकाने के लिये नये उधार लिये जाते हैं, तब साहूकार अपने हितानुसार शर्तें लगा देते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था को कैसे चलाना चाहिये। दुनिया में आर्थिक संकट और मुद्रा अवमूल्यन जैसी कई वजहों से देश उधार नहीं चुका सकता है। जब देश में मजदूर, किसान, मध्यम वर्ग जमींदार और पूंजीपति हैं, तो कर्ज का बोझ सभी तबकों पर बराबर नहीं होता है। हमेशा उधार से फायदा शोषकों को होता है, जब कि मेहनतकशों को उधार चुकाने का बोझ उठाना पड़ता है।

पूंजीपति अपने कारोबारों के विस्तार के लिये सरकार पर दबाव डालते हैं कि कितना उधार लेना चाहिये और कैसे पूंजी निवेश किया जाना चाहिये, चाहे इससे मजदूरों और जनता को फायदा हो या न हो। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संस्थानों से रियायती सहायता के रूप जो उधार लिये जाते हैं, जो स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण सुरक्षा, वन कल्याण, वृक्षारोपन, इत्यादि के नाम पर लिये जाते हैं, वे भी नेताओं, सरकारी अफसरों और बिचैलियों के जेब भरने में खर्च हो जाते हैं और बहुत छोटा सा हिस्सा ही उन लोगों तक पहंुचता है जिनके नाम पर उधार लिया गया था। आम जनता के गिरते जीवन स्तर, निरक्षरता, गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, इत्यादि इस सच्चाई की गवाही देते हैं।

हाल के सालों में देश के अंदरूनी और बाहरी कर्ज भुगतान की स्थिति बहुत बिगड़ी है (देखिये चित्र)। 1997-98 में हिन्दोस्तान का पूरा कर्ज और ब्याज़ बोझ लगभग 7,74,000 करोड़ रुपये है। यह पूरा बोझ इस साल की अवधि में सम्पूर्ण घरेलू उत्पादन की कीमत का 55 प्रतिशत हिस्सा है। इन अंाकड़ो से यह भी जाना जाता है कि हर हिन्दोस्तानी के सिर पर 8500 रु0 कर्ज का बोझ है।

एक तरफ, हिन्दोस्तानी लोगों का कर्ज भार बढ़ रहा है और सरकार दावा करती है कि लोगों की जिंदगी की बुनियादी जरुरतों के लिये पैसा नहीं है। दूसरी ओर हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों के मुनाफे लगातार बढ़ते जा रहे हैं। स्विडज़रलैंड के बैंको द्वारा अनुमान लगाया गया है कि हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों, नेताओं, और राजनीतिक पार्टियों ने विदेशी बैंको में लगभग 100 अरब डालर छुपा रखा है, जो कि हिन्दोस्तान के पूरे विदेशी कर्जे से ज्यादा है।

पूंजीपति लोगों के नाम पर उधार लेते आये हैं, और इसके जरिये लोगों की जमीन और श्रम को लूटते आये हैं। फिर ब्याज़ चुकाने के लिये लोगों से अदायगी क्यों की जाए, और वह भी भूखे, बेघरबार लोगों से? लोग ब्याज़ भुगतान पर रोक लगाने की मांग क्यों न करें?

दिल्ली में आवास क्षेत्र का निजीकरण

केन्द्रीय सरकार ने शहरी आवास और मकान निर्माण क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिये खोल दिया है। जिन कंपनियों को शहर में 30 एकड़ तक इकट्ठी जमीन मिल जाती है उन्हें इज़ाज़त है कि वे इस जमीन को विकसित करें और मकान निर्माण करें। इसका यह मतलब होगा कि कुछ मुट्ठीभर मकान निर्माण कंपनियां राजधानी में सारी अच्छी जमीन खरीद लेंगे और मोटे मुनाफे बनायेंगे। पहले से ही असमान आवास स्थिति और बिगड़ जायेगी।

दिल्ली की जनता की आवास स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है। हर हफ़्ते, हजारों लोग देश के अलग अलग इलाकों से दिल्ली आते हैं रोजी रोटी की तलाश में, क्योंकि गांव में उनका रोजगार खत्म हो गया है। सरकार की नीति ऐसी है कि इन लोगों के लिये शहर में रोजी रोटी कमाना और अपना घर बसाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। लाखों मेहनतकश झुग्गियों में या सड़कों पर रहतें हैं, वहां से भी उन्हें बार बार हटा दिया जाता है।

इन लोगों का श्रम ही सभी धन दौलत और मुनाफों का स्रोत है, पर सरकार उन्हें रहने की जगह दिलाने के लिये कुछ नहीं करती है। इनमें से अधिकतम लोगों के पास सही घर नहीं हैं, पानी, बिजली या शौच प्रबंध नहीं है, उन्हें अस्वच्छ और अस्वस्थ वातावरण में रहना पड़ता है। उनके बच्चों को सड़कों पर गड़ियों के खतरों का सामना करते हुये खेलना पड़ता है। कड़कती धूप में और ठिठुरती सर्दी में उनके ऊपर छत नहीं होती। यह देश की राजधनी में लोगों की हालत है! क्या यह हमारे देश के लिये गर्व की बात है?

पर क्या सरकार की नई शहरी विकास योजना इन समस्याओं को हल करेगी? नहीं! मेहनतकशों की जरूरतें पूरी करने के बजाय, सरकार जमीन विकास में रुचि रखने वाली निजी कंपनियों की सहायता कर रही है। ये कंपनियों आम जनता के लिये मकान नहीं बनायेंगी। ये कंपनियां बहुराष्ट्रिक कंपनियों, आदि के लिये शानदार दफ्तरें बनायेंगी। उनके द्वारा बनाई गई इमारतें आम जनता की पहुंच के बाहर होगी।

यह दिखाने के लिये कि वह गरीबों के लिये भी सोचती है, सरकार ने निजी कंपनियों को आदेश दिया है कि उन्हें जमीन की कीमत के बीस प्रतिशत हिस्से को गरीबों के आवास फंड के रूप में देना पड़ेगा। पर यह पैसा कोैन देगा?

मुनाफे के भूखे जमीन विकास करने वाले तो यह भी नहीं बतायेंगे कि उन्होंने कितने पैसे के लिये जमीन खरीदे। क्या सरकार यह नहीं जानती है? और फिर मजदूर मेहनतकश, जिनके बगैर समाज नहीं चल सकता, उनके आवास पर सिर्फ 20 प्रतिशत ही क्यों? किसको बेवकूफ बनाने की कोशिश की जा रही है?

अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों की तरह, शहरी विकास क्षेत्र में भी, सरकार की नीति का मकसद है चंद अमीरों के अधिकतम मुनाफों को बनाये रखना तथा पहले से ही वंचित को और वंचित करना। मेहनतकश को सोने के लिये दो गज़ की जमीन भी नहीं मिलेगी पर अमीर, निजी पूंजीपतियों को जमीन-मकान खरीद-बेचकर बेशुमार मुनाफे कमाने का मौका मिलेगा।

 

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